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सागर की भांति ही गहरे थे रामानंद सागर

सागर की भांति ही गहरे थे रामानंद सागर

वह इतवार की सुबह होती थी जब सड़कें सुनसान हो जाती थीं और लोग अपना कामकाज छोड़कर टेलीविजन से चिपक जाते थे अपना सर्वाधिक पसंदीदा धारावाहिक रामायण देखने के लिए ।

देश और दुनिया के लाखों टेलीविजन दर्शकों पर जादू करने वाले इस धारावाहिक को रामानंद सागर ने जिस तरह पेश किया था उसके चलते वह दर्शकों के बीच एक जीवित किंवदंती बन गए थे। उस समय टेलीविजन हालांकि बहुत कम घरों में होता था ्र फिर भी रामानंद सागर का नाम हर कोई जानता था। रामायण देखने के लिए आलम यह होता था कि लोग इतवार की सुबह का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते थे और एक़- एक टेलीविजन सेट पर गांव़मुहल्ले के लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था । बस और ट्रकों के ड्राइवर अपने वाहनों को ब्रेक लगाकर रामयण देखने के लिए किसी ढाबे में लगे टेलीविजन से चिपक जाते थे।

फिल्म समीक्षक रामकिशोर पारचा का कहना है कि रामांनद सागर छोटे परदे के क्षेत्र में अपने पीछे एक ऐसा करियर छोड़ गए हैं जो किसी विरले को ही नसीब होता है। प्रतिभा के मामले में वह सागर की भांति ही गहरे और विशाल थे ।रामानंद सागर का जन्म लाहौर के नजदीक असल गुए नामक स्थान पर 29 दिसंबर 1927 को एक धनाढय परिवार में हुआ था। रामानंद को उनकी नानी ने गोद लिया था । पहले उनका नाम चंद्रमौली था  लेकिन नानी ने उनका नाम बदलकर रामानंद रख दिया। रामानंद सागर अक्सर स्वीकार करते थे कि उन्हें अपने असल माता पिता का प्यार नहीं मिला । जब वह 16 साल के थे तो उनकी गद्य कविता श्रीनगर स्थित प्रताप कालेज की मैगजीन में प्रकाशित होने के लिए चुनी गई । दहेज प्रथा को अस्वीकार करने के कारण जब उन्हें घर से बाहर कर दिया गया तो जिन्दगी जीने के लिए उनका संघर्ष शुरू हो गया ।

युवा रामानंद ने पढ़ाई जारी रखने के लिए ट्रक क्लीनर और चपरासी के रूप में नौकरी की । वह दिन में काम करते और रात को पढ़ाई । मेधावी होने के कारण उन्हें पंजाब विश्वविद्यालय :पाकिस्तान: से स्वर्ण पदक मिला और फारसी भाषा में निपुणता के लिए उन्हें मुंशी फजल के खिताब से नवाजा गया । इसके बाद सागर एक पत्रकार बन गए और जल्द ही वह एक अखबार में समाचार संपादक के पद तक पहुंच गए । उन्होंने 22 छोटी कहानियां, तीन वहत़,लघु कहा, दो क्रमिक कहानियां और दो नाटक लिखे । उन्होंने इन्हें अपने तखल्लुस चोपड़ा,बेदी और कश्मीरी के नाम से लिखा लेकिन बाद में वह सागर तखल्लुस के साथ हमेशा के लिए रामानंद सागर बन गए ।

रामानंद जब बंटवारे के समय 1947 में भारत आए तो उस वक्त उनके पास सपंत्ति के रूप में महज पांच आने थे । भारत में वह फिल्म क्षेत्र से जुड़े और 1950 में खुद की प्रोडक्शन कंपनी सागर आटर्स बनाई जिसकी पहली फिल्म मेहमान थी ।  वर्ष 1985 में वह छोटे परदे की दुनिया में उतर गए और विक्रम बेताल, दादा़-दादी की कहानियां, रामायण,कष्णा,अलिफ लैला और जय गंगा मैया जैसे सुपर डुपर हिट धारावाहिक बनाए। धारावाहिक रामायण ने लोगों के दिलों में रामानंद सागर की छवि एक आदर्श व्यक्ति के रूप में बना दी ।

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