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गाय-भैंसों को चारे में दें लहसुन, बढ़ेगा उनका दुध

गाय-भैंसों को चारे में दें लहसुन, बढ़ेगा उनका दुध

यह कोई टोना-टोटका नहीं, बल्कि बाकायदा वैज्ञानिक सत्य है कि अगर दूध देने वाली गाय-भैंसों के चारे में लहसुन मिला दिया जाए तो वे कम मात्रा में मीथेन गैस वातावरण में छोड़ेंगे और इससे वे दूध भी ज्यादा देंगी।

लंदन से प्रकाशित समाचार पत्र डेली टाइम्स में हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दूध देने वाली गाय-भैंसों को लहसुन या जई यानी ओट खिलाने से ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद मिल सकती है। प्रयोगशाला में किए गए सफल परीक्षणों के बाद अब प्रयोग के तौर पर सीमित संख्या में किसानों को अपने इन दुधारु पशुओं के आहार में खासतौर पर लहसुन और जई मिलाकर देने की सलाह देने की तैयारी की जा रही है।

इससे इन जुगाली करने वाले जानवरों के मुंह से जुगाली के दौरान निकलने वाली मीथेन गैस का उत्सर्जन करीब एक चौथाई तक कम हो जाएगा। प्रयोग के दौरान पाया गया है कि गाय-भैंसों को ही नही, भेड़ को भी अगर लहसुन और जई खिलाई जाए तो वो भी अपने मुंह से कम मीथेन गैस वातावरण में छोडेगी।

वैज्ञानिकों के अनुसार विश्व में उत्सर्जित की जाने वाली कुल ग्रीनहाउस गैसों में से करीब चार प्रतिशत योगदान इन्हीं दुधारु पालतू पशुओं का होता है। वैज्ञानिकों को भरोसा है कि अगर इनके चारे में ये दो पदार्थ मिलाए गए तो उनके मीथेन उत्सर्जन में तीन से चार प्रतिशत की तो कमी आ सकती है। अनुसंधानकर्ताओं ने एक खास प्रकार का यंत्र बनाकर इन मवेशियों के मीथेन उत्सर्जन की मात्रा को मापा। अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने इन मवेशियों को अलग-अलग प्रकार के पदार्थ मिले पशु आहार खिलाने के बाद उनके मुंह से निकलने वाली मीथेन गैस को मापा।

इंगलैंड के बैंगोर विश्वविद्यालय के प्रोफसर जैमी न्यूबोल्ड का कहना है कि यह तो साबित हो गया है कि लहसुन और जई मिले पशु आहार खाने से ये पशु वातवरण में कम मीथेन गैस का उत्सर्जन करेंगे पर अभी यह देखना बाकी है कि लहसुन मिला भोजन खाने के बाद इन पशुओं के दूध और मांस के स्वाद पर क्या असर होगा।

पशुओं के चारे या उनके आहार से केवल 20 से 25 प्रतिशत उर्जा ही उनके दूध और मांस बनने में इस्तेमाल होती है, जबकि शेष उनके मल-मूत्र आदि के जरिए बाहर निकल जाती है। प्रोफेसर न्यूबोल्ड का कहना है कि गाय-भैंसों को हम प्रयोग के तौर पर भूसी रहित जई भी खिला रहे हैं जिसमें वसा का स्तर काफी अधिक होता है। लेकिन उससे भी मीथेन उत्सर्जन कम होता है। उन्‍होंने कहा कि वह इन पशुओं को खाने के साथ रसायन आदि देने के बजाय ऐसे प्राकृतिक पदार्थ देना चाहते है जिससे उन्हें किसी तरह का कोई नुकसान भी न हो और साथ ही ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आए।

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