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गर्म होती धरती और धुआं सूंघती औरतें

धरती के अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुके पर्यावरण संकट की जवाबदेही तय करने पर भले ही मतभेद हों, किन्तु इस बारे में एक राय है कि धरती गर्म होने की सबसे गहरी चोट गरीबों पर पड़ेगी। पर्यावरण पर निर्भर रहने वाला निर्धन तबका ही इसके प्रति सर्वाधिक संवेदनशील है। पर्यावरण की रक्षा के लिए यह वर्ग ही सबसे पहले आगे आता है।

इसे अगर समझना है तो आपको उत्तर भारत की हिमालय पर्वत श्रृंखला के उंचे इलाकों में जाना चाहिये। लद्दाख का पर्वतीय रेगिस्तान का यह इलाका अनूठे भौगोलिक और ऐतिहासिक दस्तावेजों का गवाह है। यहां आपको पेड़ों का नामो-निशान नहीं मिलेगा किन्तु बर्फ से घिरी चोटियों के दर्शन होंगे। यहां बहने वाली धाराओं का पानी इतना साफ है कि आपको जल के नीचे के पत्थर स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। यहां के निवासी महिला और पुरुष हृष्ट-पुष्ट हैं क्योंकि उन्हें विपरीत मौसम का सामना करना पड़ता है। कड़ाके के सर्द मौसम के बावजूद लद्दाख के लोगों का जीवन और जनता के प्रति रवैया अत्यधिक सकारात्मक है।

लद्दाख की महिलाएं तो और भी प्रभावित करती हैं। यहां रहने वाली कुंदस डोलमा वूमेंस एलाइंस संगठन की उपाध्यक्ष हैं। नार्वे निवासी हेलना नोर्बग होज ने दो दशक पहले यह संगठन बनाया था और वह लद्दाख में ही बस गईं। डोलमा हंसते-मुस्कुराते अपने संगठन द्वारा किए कार्यो का ब्यौरा देती हैं। वह बताती हैं कि पिछले दस साल से लेह में पोलीथीन बैग के इस्तेमाल पर रोक लगाने में किस प्रकार कामयाबी मिली। ‘हमने पोलीथीन के बैग से अपने जानवरों को होने वाली तकलीफ देखी। बैग खाने के बाद जानवरों का बुरा हाल हो जाता था। लेह में बहने वाली धाराओं के प्रवाह को ये बैग अवरुद्ध कर देते थे। महिलाओं ने पोलीथीन के इस्तेमाल के खिलाफ अभियान चलाया और अब लेह में कोई दुकानदार आपको इन बैगों में सामान नहीं देगा।’

लेह आने वाले पर्यटकों की भारी संख्या देखकर यह अभियान बनाए रखना आसान नहीं है। फिर भी वहां की महिलाएं सजग हैं और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध भी। पर्यटकों की संख्या में वृद्धि के बावजूद वे पानी जैसे संसाधनों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करती हैं? एक दशक पहले लेह में बहने वाली धाराओं से पर्याप्त जल मिल जाता था। अब इन जल धाराओं की संख्या काफी कम हो चुकी है तथा उनसे मिलने वाले पानी की गुणवत्ता भी घटी है।

कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार लेह पर पड़ रहा यह दुष्प्रभाव वायुमंडल में बढ़ रही कार्बन डाइऑक्साइड जैसी खतरनाक गैसों का परिणाम है। इन गैसों के कारण दुनिया का तापमान निरंतर बढ़ रहा है और हिमालय की चोटियों पर स्थित ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इस बारे में तथ्य जुटाए जा रहे हैं। ग्लेशियरों तक पहुंचना आसान नहीं है और उनकी पिघल रही बर्फ के बारे में प्रमाण जुटाने के लिए लम्बे अध्ययन की आवश्यकता होती है। इसके बाद ही दावे के साथ कहा जा सकता है कि का खतरनाक गैसों के कारण ही ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं।

महिलाओं का मानना है कि समस्या का एक कारण लेह के विकास का गलत तरीका भी है। यहां के सूखे मौसम के मिजाज के अनुकूल परम्परागत तरीके से मिट्टी और पत्थरों का इस्तेमाल कर घर बनाने के बजाए अब सीमेंट और कंक्रीट से होटल व गेस्ट हाउस बनाए जा रहे हैं। परम्परागत सूखे शौचालयों के स्थान पर फ्लश टॉयलेट का प्रयोग किया जाने लगा है जिसमें बहुमूल्य पानी बर्बाद होता है। सूखे शौचालय में पानी का प्रयोग नहीं होना तथा उनकी बदौलत खेतों के लिए पर्याप्त मात्र में अच्छी खाद भी मिल जाती थी।

जल धाराओं के पानी के इस्तेमाल के बजाए अब होटल वाले ट्यूबवेल का प्रयोग करते हैं, जिससे भूमिगत जल का दोहन हो रहा है। इससे जल संकट सिर उठा रहा है। भूमिगत जल स्तर गिर रहा है। जाड़ों में कम बर्फ गिरने से धाराओं के जल स्तर की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। आप लेह की गलियों में पानी ढोते लोग देख सकते हैं। कुछ बरस पहले तक ऐसे दृश्य की कल्पना नहीं की जा सकती थी।

कड़ी ठंड के मौसम में गर्मी के लिए आपको ईंधन की आवश्यकता होती है। इसके लिए लेह में आपको गैस मिल जाती है, भले ही इसकी कीमत उंची हो। लेकिन पहाड़ों के ढलान पर आबाद छितरी हुई बस्तियों में जहां से सड़क मार्ग तक पहुंचने के लिए तीन-चार दिन पैदल चलना पड़ता है, आपके पास ऊर्जा का एक मात्र स्नोत लकड़ी होता है। सूखी झाड़ियों से ही खाना पकाने और घर को गर्म रखने का काम किया जाता है। ईंधन के लिए प्राकृतिक साधनों पर निर्भरता एक ऐसा सूत्र है जो लद्दाख की महिलाओं को देश के अन्य हिस्सों की महिलाओं से जोड़ता है।

दुनिया के बढ़ते तापमान से गरीब महिलाओं द्वारा भोजन बनाने के तरीके की तरफ भी अचानक ध्यान आकर्षित हुआ है। अब धुंआ रहित चूल्हा विकसित करने की बात होने लगी है। गरीब महिलाएं लकड़ी और कोयले के चूल्हे पर ऐसे वातावरण में भोजन पकाती हैं जहां साफ हवा आने और धुंआ बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं होता।

हानिकारक गैसों का उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। दो दशक पहले जब जलवायु परिवर्तन विश्वव्यापी मुद्दा नहीं था तब ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रख आर्किटेक्ट व इंजीनियरों ने एक धुंआ रहित चूल्हा विकसित किया था। चंडीगढ़ स्थित महिला आर्किटेक्ट मधु सरीन ने ग्रामीण महिलाओं से बात कर उनकी जरूरत के मुताबिक ऐसा ही चूल्हा बनाया था। वह गरीब ग्रामीण महिलाओं के दर्द से वाकिफ थीं। ऐसा कार्य करने के लिए जमीनी सच से रूबरू होना जरूरी है। यह काम प्रयोगशाला में बैठकर नहीं किया
जा सकता।

धुआं रहित चूल्हा बनाने की बात अब दोबारा उठ रही है। लेकिन जो लोग इस काम में लगे हैं उन्हें शायद ही अंदाज हो कि गांव में रहने वाली औरतें किस तरह का खाना बनाती हैं। यदि खराब परिस्थिति में खतरनाक गैसों से जूझते हुए भोजन बनाने वाली देश की लाखों महिलाओं की कठिनाई का समाधान पहले हो जाता तो हमारा देश पूरे विश्व को यह बताने का दावा कर सकता था कि खतरनाक गैसों के उत्सजर्न पर काबू पाने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं वे किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण नहीं, अपनी जनता के स्वास्थ्य के कारण हैं। दुनिया गरम हो या ठंडी, समुद्रों का जल स्तर घटे या बढ़े, वास्तव में सारे कदम जनता का हित ध्यान में रखकर ही उठाए जाने हैं। जलवायु परिवर्तन का सीधा संबंध भी आम आदमी के जीवन से है।

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

kalpu.sharma@gmail.com

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