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तेलंगाना : आशंका के बीच बंधी उम्मीद

तेलंगाना जल रहा है। चार दशकों से भी ज्यादा पुरानी अलग राज्य की मांग ने फिर से दौर पकड़ा है। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) अध्यक्ष कल्वकुंतला चन्द्रशेखर राव आमरण भूख हड़ताल किसी तरह से एक मोड़ पर पहुंच कर खत्म हुई है। छात्र और सरकारी कर्मचारी सड़कों पर उतर आये और इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए कुछ दूसरे आंदोलन खड़े हो गए। इन सबने मिलकर स्थिति को विस्फोटक बना डाला।

लेकिन केन्द्र सरकार के लिए यह मांग मानना किसी भी तरह से आसान नहीं था। वैसे ही चन्द्रशेखर राव के लिए भूख हड़ताल तोड़ना और आंदोलन को वापस लेना भी आसान नहीं था। पहली बात यह थी कि अगर मौजूदा दबाव के आगे अगर केन्द्र सरकार झुक गई तो देश के दूसरे हिस्सों से भी इसी तरह की मांगें उठ खड़ी होंगी। संप्रग सरकार के लिए इस मांग को न मानने का एक और कारण भी था। सुरक्षा एजेंसियों ने चेताया है कि अगर इस मांग को सिद्धांत रूप से भी मान लिया तो इस इलाके में माओवादी काफी मजबूत हो जाएंगे।

चन्द्रशेखर राव को ये बातें मालूम है लेकिन इसके बावजूद वे इस हद तक आ गए थे। उसकी दो वजहें थीं। पहली यह कि पिछले पांच छह साल में तेलंगाना मुद्दा हाशिये पर चला गया था और चन्द्रशेखर राव की अपनी हैसियत राजनीति में कमजोर हो गई थी। ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (जीएमसी) के चुनावों की घोषणा ने इस बात को और महत्वपूर्ण बना दिया था। टीआरएस प्रदर्शन पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अच्छा नहीं रहा था, और इन चुनावों में तो उसके सफाये का खतरा दिखने लगा था। चन्द्रशेखर राव यह जानते थे इसलिए उन्होंने इस आधार पर चुनाव का बहिष्कार किया कि उनकी प्राथमिकता अलग तेलंगाना राज्य को पाना है। यह घोषणा करने के बाद उन्हें एक आंदोलन शुरू करना ही था और वाईएस राजशेखर की अनुपस्थिति ने मौके को और माकूल बना दिया।

यह ध्यान देने की बात है कि सन् 2004 के विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में टीआरएस के साथ गठबंधन का कांग्रेस को बहुत फायदा हुआ। वाईएस राजशेखर रेड्डी ने इसे सफल गठबंधन बनाया था और उन्होंने ही सत्ता में आने के बाद तेलंगाना मुद्दे को हाशिये पर डाल दिया। टीआरएस सांसदों और विधायकों ने एक साथ इस्तीफा दिया लेकिन लोगों को चन्द्रशेखर राव की नीयत पर भरोसा नहीं हुआ और उन्हीं सीटों पर हुए उपचुनाव में पार्टी को भारी नुकसान हुआ। 

टीआरएस ने इसी नारे के साथ चुनाव लड़े थे कि ये उपचुनाव तेलंगाना राज्य पर जनमत संग्रह है लेकिन तब भी पार्टी को सोलह विधानसभा सीटों पर से सिर्फ  7 और 4 लोकसभा सीटों में से सिर्फ दो सीटें मिलीं। फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि इन चुनावों में लगभग सारी महत्वपूर्ण पार्टियों ने खुले तौर पर यह कहा कि वे अलग तेलंगाना की मांग के खिलाफ नहीं हैं। इन पार्टियो में तेलुगू देशम पार्टी भी शामिल है जो हमेशा से राज्य के विभाजन का विरोध करती रही है। अगर टीडीपी का हृदय परिवर्तन पहले हुआ होता तो तेलंगाना राज्य अब तक बन चुका होता क्योंकि भारतीय जनता पार्टी जब सत्ता में थी तब उसने छोटे राज्य बनाने का अपना चुनावी वायदा निभाया था। अगर तेलंगाना के समर्थकों को इस मौके का फायदा नहीं मिला तो इसकी वजह टीडीपी का घोर विरोध ही था।

चन्द्रशेखर राव की भूख हड़ताल इस हद तक नहीं आती अगर कांग्रेस उन्हें रोकने के कुछ प्रतीकात्मक उपाय कर लेती। टीआरएस के सूत्र मानते हैं कि कांग्रेस और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी अगर बातचीत का निमंत्रण दे देती तो भी चन्द्रशेखर राव मान जाते। ऐसा कोई निमंत्रण तो नहीं आया बल्कि के रोसैया प्रशासन की गड़बड़ी की वजह से चन्द्रशेखर राव न लौटने वाली स्थिति में पहुंच गए। जब चन्द्रशेखर राव अपनी भूख हड़ताल शुरू करने ही वाले थे तो उन्हें खम्मम जेल ले जाया गया और अगले दिन उन्हें पीने को कोई जूस दिया गया जो उन्होंने स्वीकार कर लिया।

जब सारे टेलीविजन न्यूज चैनलों पर इस घटना को दिखाया गया तो लोग भड़क उठे। छात्र उग्र हो उठे। राव को अस्पताल से स्पष्टीकरण देना पड़ा कि सरकार ने उन्हें धोखा दिया है। अब वे कुएं और खाई के बीच फंस गये थे। भूख हड़ताल वे तोड़ नहीं सकते थे, इससे उनकी राजनीति ध्वस्त हो जाती और इसे ज्यादा देर तक जारी नहीं रख सकते थे क्योंकि उनकी सेहत इसे बर्दाश्त नहीं कर पाती। संकट राव और सरकार दोनों के सामने था। और इसी समय पर कांग्रेस ने विधानसभा में तेलंगाना राज्य के लिए प्रस्ताव लाने की बात करके हालात को बिगड़ने से बचा लिया।

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

radhaviswanath73@yahoo.com

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