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पृथ्वी है वसुंधरा

पिछले सीज़न में पर्याप्त अथवा आवश्यक वर्षा नहीं होने से उपज की कम मात्र होने की आशंका सरकारी अनुमानित आंकड़ों से व्यक्त की जा रही है। ऊपर से महंगाई की मार ने आम उपभोक्ता को भयाक्रांत कर रखा है।

मौसम की बेवफाई तथा स्टॉकिस्टों द्वारा पैदा की गई कृत्रिम कमी या अभाव ही महंगाई का कारण है, वरना पृथ्वी तो वसुंधरा है- सोना उगलने वाली धरा। ऋग्वेद के तीसरे मंडल के चवालीसवें सूक्त के तीसरे मंत्र- ‘द्या मिंद्रो हरिधायसं पृथ्वीं.. ये यो: अन्त: हरि (सूर्य) चरत्’- में बतलाया गया है कि अनंत ऐश्वर्यशाली भगवान् ने द्युलोक में सूर्य-चंद्र-नक्षत्र प्रकाशित कर रखे हैं। इन्होंने सुवर्ण धाराओं वाली पृथ्वी को हरियाली युक्त तथा सुनहरी छवि वाले अन्न-भंडार में प्राणियों के भोजन की व्यवस्था कर रखी है।

इस व्यवस्था में भोजन का अभाव पैदा करने में दोष स्वार्थ-लोलुप्त तथा निर्दयता के आधीन बने परिग्रही मनुष्य का है। वरना सूर्य-चंद्र आदि ज्योतिपुंज और दीप्तिमान ग्रह-नक्षत्र ऐसे प्रतीत होते हैं मानो आकाशरूप कसौटी पर जांचने परखने की स्वर्ण-रेखाएं हों और इधर पृथ्वी पर नज़र डालें तो शस्य-श्यामला धरती पर लहलहाती अनाज की सुनहरी बालियां तथा देवदार, चीड़, कैल आदि विविध वृक्ष-गुल्म व लताओं का विस्तार संपन्नता का सूचक है। ये सब ईश्वरीय उपहार है जिनका स्वार्थ में अंधा पड़ चुका मनुष्य कृतघ्न हो जाता है और इस ईश्वरीय सौगात का निर्दयतापूर्वक दोहन करता है।

हतबुद्धि मनुष्य वसुंधरा पर्याय से जानी जाने वाली संपन्न पृथ्वी को उजाड़ने में कुरूप करने में क्रूरता से जुटा हुआ है। यह अंधकार है मनुष्य का जिसमें पड़ कर वह नित्य नये संसाधनों का अविष्कार तो कर रहा है किन्तु उन साधनों की पहुंच समाज के अंमित आदमी तक नहीं पहुंचने दे रहा । वेद में बतलाया गया है- ‘आधारयद् हरितो: भूरि योजनम्’ अर्थात् भगवान ने द्युलोक व पृथ्वीलोक में पर्याप्त भोजन दे रखा है और समस्त प्राणी अपना भोजना यहीं से लेते हैं। परन्तु इन आविष्कारों के प्राप्त संसाधनों का दुरुपयोग मनुष्य करेगा तो वह आत्मघाती तथा प्रलयकारक ही होगा।

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