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एक स्कूटर की विदाई

यह सिर्फ एक स्कूटर ही नहीं एक सपना था। देश की पूरी दो पीढ़ियों ने जिस पर चढ़कर तरक्की के आसमान को छूने की कोशिश की थी। 1979 में एक वक्त वह आया था जब बजाज स्कूटर खरीदने वालों की वेटिंग लिस्ट 13 साल लंबी हो गई थी और ब्लैक मार्केट में नया बजाज स्कूटर दुगने से भी ज्यादा कीमत पर हाथों-हाथ बिक रहा था। यह आंकड़ा यही बताता है कि बजाज स्कूटर की सवारी के सपने को हकीकत में बदलने की इच्छा पूरे समाज में कितनी बलवती थी।

13 साल इंतजार करने के लिए बुकिंग करवाने, या फिर काला बाजार से उसे खरीदने की आर्थिक हैसियत रखने वाले वालें लोगों के दायरे से बाहर एक उससे बहुत बड़ा तबका उन लोगों का भी था जिनके लिए यह बजाज स्कूटर एक हसरत था। मेहनत करते वक्त यह सोचने वाले लोग बहुत थे कि खूब कमाकर एक दिन बजाज स्कूटर खरीदेंगे। उस समय का एमआरटीपी एक्ट बजाज ऑटो को उत्पादन क्षमता बढ़ाने की इजाजत नहीं देता था और इस प्रावधान ने भारतीय मध्यवर्ग में इस स्कूटर के तिलिस्म को और बढ़ा दिया था।

50 साल पहले जब पहली बार बजाज ऑटो ने इसे इटली की कंपनी की तकनीक से इसे बनाया तो यह अपने मूल नाम वेस्पा के साथ ही बाजार में आया था। क्रिकेट की तरह ही इसका आविष्कार भले ही यूरोप में हुआ हो लेकिन कुछ ही समय में यह शुद्ध भारतीय वाहन बन गया था। घर का सामान लादने से लेकर पूरे परिवार को ढोकर ले जाने की भारतीय आम परिवारों की सारी जरूरते यह पूरी करता था। फिर गड्ढों, खांचों, खड़ंजों वाली सड़कों पर यह बखूबी चल लेता था। एक मशीन के रूप में यह भरोसमंद था और तकनीक इतनी सरल की गली नुक्कड़ के मिस्त्री इसे आसानी से दुरुस्त कर लेते थे।

तकनीक की इसी खासियत ने बजाज स्कूटर को बाजार में उपलब्ध दूसरे स्कूटरों के मुकाबले कहीं ज्यादा लोकप्रिय बना दिया था। लेकिन बजाज स्कूटर ने जिस दौर की जरूरत को पूरा किया वह दौर अब बदल चुका है। पूरी दो पीढ़ियों ने इस स्कूटर पर चढ़कर जिन मंजिलों को हासिल किया था नई पीढ़ी को उससे आगे की मंजिलों को छूना है। इसलिए बाजार में अब उसकी मांग नहीं है, बजाज ऑटो को इस स्कूटर में अब कोई भविष्य नहीं दिखाई दे रहा। और फिर हर अच्छी चीज की तरह ही बजाज स्कूटर को भी एक दिन विदा होना ही था।

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