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मिसाइल ही नहीं, मन को भी उड़ान देता है चांदीपुर

यात्रा या पर्यटन की बात होते ही आमतौर पर लोग गोवा, गुलमर्ग, ऊटी या फिर स्विटजरलैंड, पेरिस
 आदि की चर्चा करते हैं। सैर-सपाटे के मामले में जो थोड़ा फर्क मिजाज रखते हैं वो ज्यादे से ज्यादा जैसलमेर के रेगिस्तान या मिस्त्र के पिरामिड, या फिर इन्हीं तरह की जगहों को चुनते हैं। लेकिन यात्रा के लिहाज से हम जिस जगह की चर्चा कर रहे है, हो सकता है उसे पढ़कर आप कुछ देर के लिए चौंक जाएं। यह जगह है उड़ीसा स्थित चांदीपुर
। इस जगह को ज्यादातर लोग मिसाइलों के परीक्षण स्थल के रूप में जानते हैं।

आइए... हम और आप मिलकर करते हैं इसी चांदीपुर की यात्रा। देश-दुनिया में विख्यात चांदीपुर कभी गुमनाम बंजर द्वीप था, जिसे सत्तर के दशक में तत्कालीन रक्षा मंत्री केसी पंत के सहयोग से मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम और उनके दल ने हरेभरे नखलिस्तान में तब्दील कर दिया।

दुनिया में चारों ओर जब वैश्विक तापमान वृद्धि और ग्रीन हाउस गैसों के मद्देनजर जलवायु को हो रहे नुकसान पर चर्चा हो रही है, उस समय अपने ही देश में चांदीपुर की हरित यात्रा और भी प्रेरणा देने वाली बन जाती है। एक बंजर द्वीप से हरेभरे मनोरम स्थान बनने की चांदीपुर की यत्रा बेहद रोचक और दिलचस्प है।

मिसाइल परीक्षणों के लिए प्रसिद्ध चांदीपुर दो दशक पहले आज से बिल्कुल अलग था। उस समय समुद्र से घिरे इस सुंदर स्थान में हरियाली नहीं थी और यह एकदम खाली खाली सा लगता था। इत्तेफाक से इन्हीं दिनों 1989 में अग्नि मिसाइल के परीक्षण का कार्यक्रम बना। उस समय दुनिया की भू-राजनीतिक स्थिति गहमा-गहमी भरी थी। परीक्षण के लिए निर्धारित तिथि से एक दिन पहले रात में तत्कालीन रक्षा मंत्री केसी पंत, प्रमुख विज्ञानी अरूणाचलम और काम यहां टहल रहे थे। टहलते हुए पंत अचानक कलाम की मुड़कर पूछा कि कल अग्नि का परीक्षण निश्चित तौर पर सफल होगा, इस अवसर पर आपको क्या चाहिए।

कलाम ने पंतजी से कहा कि क्या आप मुझे चांदीपुर में लगाने के लिए एक लाख वृक्ष की मंजूरी दिला सकते हैं। पंतजी ने इस विचार की प्रशंसा करते हुए योजना को मंजूरी प्रदान कर दी। लगभग पांच वर्षों के अथक परिश्रम के बाद चांदीपुर में लाखों की संख्या में पेड़ लगाए गए। ...और आज अगर आप चांदीपुर जाएंगे तो चारों ओर हरियाली का नजारा देखने को मिलेगा। समुद्र तट से लगे इस द्वीप में प्राकृतिक सौंदर्य की अनोखी छटा मन मोह लेगी।

देशी और प्रवासी पंछियों का चहचहना, समुद्र से निकल कर कछुओं का रेत पर उन्मुक्त वातावरण में विचरण करना मन को अभिभूत कर देता है। और यह सब हरियाली और पेड़-पौधें के कारण संभव हो पाया।

चलिए, चांदीपुर की यात्रा यहीं समाप्त करते हैं। मगर विदाई से पहले ज्ञान की दो बातें भी आपसे बांटते चलें। पहला, एक वृक्ष दिन में 20 किलोग्राम कार्बन डाई आक्साइड गैस सोखता है और 14 किलोग्राम ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ता है। और दूसरा, केन्या की सामाजिक कार्यकर्ता बंगारी मथाई को वृक्षारोपण कार्यक्रम के कारण नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

अगर आपके पास भी कोई यात्रा वृतांत है तो जरूर शेयर कीजिए। यदि आपकी यात्रा लोकल भी है तो हम उसे ग्लोबल बनाएंगे और साथ में पा सकते हैं अच्छे पुरस्कार भी। तो देर किस बात की!

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