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तांगा लाहौरी, घोड़ा पिशौरी

तांगा लाहौरी, घोड़ा पिशौरी

वे भी क्या दिन थे, जब दिल्ली की सड़कों पर तांगे अपनी टापों के संगीत में दौड़ते चले जाते थे और सवारियां खूब मजे लेती थीं। दिल्ली नगर निगम द्वारा जारी किए नए आदेश ने घोड़ों से उनकी टापें छीन ली हैं और दिल्ली वालों से उनका इतिहास, उनकी तहजीब और उनके तांगे। आज भी लोगों के जेहन में वो दिन याद हैं, जब तांगे कुतब रोड, फतेहपुरी, खारी बावली, लाल कुआं, हौज काजी, अजमेरी गेट, सदर बाजार, गांधी नगर, महरौली, ओखला आदि तक का सफर करते थे।

मोहम्मद रफी ने क्या खूब गाना गाया है, ‘तांगा लाहौरी मेरा, घोड़ा पिशौरी मेरा। बैठो मियां जी, बैठो लाला, मैं हूं अलबेला तांगे वाला!’ एक और मजेदार गाना जो बच्चों को बहुत पसंद है, वह है, ‘लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा, घोड़े की दुम पर जो मारा हथौड़ा।’ तांगों में हर प्रकार के घोड़े जुता करते थे, जैसे - अरबी, तुर्की, ईरानी, तुर्किमेनिस्तानी, तिब्बती आदि। भारत में कश्मीर, पंजाब, कूचबिहार और आगरा के घोड़े अच्छी नस्ल के माने जाते हैं।
सुरेश तांगे वाले के अनुसार, ‘सरकार के नए अध्यादेश से न जाने कितने तांगे वालों के घर चूल्हा नहीं जल पाएगा और न जाने कितने घोड़े बेमौत मारे जाएंगे। एक तांगे वाले से बहुत से परिवार जुड़े होते हैं, जैसे घोड़े की नालें बनाने वाले का परिवार, घोड़े का चारा बनाने वाले का परिवार, घोड़े के साईस का परिवार, तांगा बनाने वालों का परिवार, घोड़े की चिकित्सा करने वालों का परिवार आदि।’

तांगा पुरानी दिल्ली की शाहजहां आबादी सभ्यता का एक जीता-जागता उदाहरण था, कहते हैं जियाऊ  पहलवान तांगे वाले। तांगे से पूर्व भी घोड़ों एवं जानवरों द्वारा खींची जाने वाली गाड़ियां मौजूद थीं जैसे - इक्का, हवादार, सुखपाल, चंडोल, पालकी, नालकी, निमें, डोली, शिकरम आदि। पुराने समय में न तो सड़कें ही ठीक-ठाक बनी हुई थीं और न ही कोई सुरक्षा थी, जिसके कारण लोग बाहर निकलने से डरा करते थे। जब नवाबों, राजाओं, बादशाहों आदि की सवारियां निकलती थीं तो उनके साथ बहुत सारे हाथी, घोड़े, ऊंट आदि निकला करते थे।

बकौल पप्पू तांगे वाले के, ‘आज न तो वे सवारियां हैं और न ही उनमें चलने वाले पुराने लोग।’ वर्तमान समय का तांगा तेज दौड़ती सवारियों एवं रिक्शाओं से मात खा चुका है, भले ही फिल्मों में बसंती की धन्नो ने, मर्द तांगे वाले ने, दिलीप कुमार ने, ओ.पी. नैयर ने अपने घोड़ों और तांगों द्वारा कितनी ही मोटरों को हरा दिया हो। आज की जमीन से जुड़ी सच्चााई यही है कि अब दिल्ली की सड़कों पर तांगे नहीं दिखाई दिया करेंगे। बकौल पप्पू, ‘तांगे वालों के लिए यह बेरोजगारी का प्रश्न तो है ही, साथ ही उनके सामने अपने घोड़ों के रख-रखाव और खाने-पीने की समस्या भी उत्पन्न हो जाएगी। घोड़ा भी तब तक दमदार रहता है कि जब तक वह दौड़े, वजन उठाए और मेहनत करे।’
तांगों की घटती संख्या की बात करें तो 1971 में दिल्ली में लगभग 3500 तांगे थे, जो घट कर 1981 में 2000 रह गए और 1991 में मात्र 1000 ही बचे। आज दिल्ली में केवल 232 रजिस्टर्ड तांगे हैं, जिनमें शायद 50 ही सड़कों पर आते होंगे। एक दौर था कि ये तांगे 1 आने से लेकर 2 आने, 3 आने या 4 आने तक सवारियों को दूर-दूर तक ले जाया करते थे। आज रिक्शा ने इनकी जगह ले ली है।  सिवाए दुकानदारों का सामान लाने-ले जाने के अलावा इनका इस्तेमाल कम ही देखने को  मिलता है।

तांगे की सवारी की सबसे बड़ी खासियत है, उनका प्रदूषण से मुक्त होना। यही नहीं, एक तांगा वास्तव में 2 मोटर गाड़ियों का बोझा ढो सकता है। जहां बैलगाड़ी एक दिन में मात्र 20 किलोमीटर सफर तय करती है, वहीं एक तांगा लगभग 80 किलोमीटर दौड़ सकता है। इस तरह तांगों के समाप्त होने का अर्थ है एक युग की समाप्ति, एक सभ्यता की समाप्ति और एक इतिहास का खात्मा। 

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