class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पर्यावरण : ऐसे गठजोड़ से नहीं बदलेगी दुनिया

आइए साफ बात करें। कोपेनहेगन सम्मेलन शुरू होने के साथ यह सवाल अहम हो गया है कि जलवायु विरोधी अमेरिका को साथ लेने के लिए दुनिया कितना नीचे झुकेगी? क्या कोपेनहेगन में किया जाने वाला खराब समझौता कोई समझौता न करने से बेहतर है? जलवायु के बारे में अमेरिका का इरादा अच्छा नहीं है। उसने कह दिया है कि वह अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का निर्वाह करेगा बल्कि घरेलू कानून का रास्ता अपनाएगा। इस प्रकार वह राष्ट्रीय स्तर पर बने कानूनों के लक्ष्यों पर काम करेगा।

दूसरी बात यह है कि वह जिस मात्र में कटौती करेगा वह उस अपेक्षा के आसपास भी नहीं है जो उससे की जा रही है। दुनिया की आबादी के पांच फीसदी वाले इस देश में जहां वैश्विक हिस्से का 16 फीसदी हाहाकारी उत्सर्जन होता है, वहां जितनी कटौती की बात की जा रही है वह नगण्य है। यहां हम उस तथ्य पर जोर नहीं देना चाहते कि अमेरिका अकेले वैश्विक उत्सर्जन के 30 फीसदी के लिए जिम्मेदार है। फिर भी अगर आप दुनिया के गरीबों पर जलवायु परिवर्तन के असर के बारे में सोचते हैं तो यह आपराधिक है।

तीसरी बात यह है कि कटौती के इस छोटे से लक्ष्य में वह उत्सर्जन क्रेडिट भी शामिल है जो वह विकासशील देशों से खरीद रहा है। इसका लब्बोलुआब यह है कि वह 2017 तक उत्सर्जन बढ़ाता रहेगा। यह दोहरा अपराध और निंदनीय है। इतनी भी कटौती वह तब करेगा जब चीन , भारत और दूसरे प्रदूषणकारी देश दुनिया के इस दरोगा को रियायत देने की इस योजना में उसका साथ देंगे।

इसके अलावा 2012 के बाद की जलवायु व्यवस्था की कानूनी संरचना के लिए एक आस्ट्रेलियाई प्रस्ताव भी है। आस्ट्रेलिया ऐसा देश है जिसका कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन 1990 के बाद 40 प्रतिशत तक बढ़ा। आस्ट्रेलिया इस गठजोड़ का वफादार सैनिक है। उसका कहना है कि सभी पक्षों को एकजुट करने वाले दायित्वों के आधार पर दुनिया को एक समझौता करना चाहिए। बात बिल्कुल सरल सी है। अल्पविकसित देशों के अलावा बाकी देशों का एक राष्ट्रीय कार्यक्रम होना चाहिए और वही अंतरराष्ट्रीय समझौते का आधार बनेगा। यह राष्ट्रीय कार्यक्रम घरेलू कार्यक्रम या कानून पर आधारित है, लेकिन सभी राष्ट्रीय कार्रवाइयों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी होनी चाहिए।

आस्ट्रेलिया का यह प्रस्ताव एक तीर से दो शिकार करता है। एक तरफ यह प्रस्ताव उस क्योटो संधि से छुटकारा दिला देता है जो पूरी दुनिया और अनुलग्नक-1 के देशों के बीच बेचैन करने वाला विभाजन पैदा करती है। संधि के अनुसार अनुलग्नक-1 के औद्योगिक देश जो ऐतिहासिक और सामयिक तौर पर भारी उत्सर्जन करते हैं उन्हें पहले कार्रवाई करनी चाहिए। यह प्रस्ताव अमेरिका को भी साथ लेकर चलता है। ऐसे माहौल में राष्ट्रपति ओबामा कोपेनहेगन पहुंच कर जलवायु रक्षा के नायक बन जाएंगे। अब सारी जरूरत गठजोड़ को पूरा करने की है। इसके लिए जी-77 को विभाजित कर एक और बड़े असहमत देश को साथ ले आना है। जाहिर सी बात है वह देश भारत के अलावा और कौन हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया हमारे भय को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने के अभियान में लगा हुआ है। यह भय अमीर देशों के बीच अलग-थलग पड़ने और हिकारत की नजर से देखे जाने का है। एक ऐसी छवि बनाई गई है कि भारत जलवायु विरोधी है। वह जलवायु के आख्यान को ठीक से समझ ही नहीं सका है। वह हर बात पर न करता रहता है और समझौतों में फच्चर फंसाता रहता है। हमारे राजनेता ऐसे आरोप को अभिशाप मानते हैं।

अगर हम गठजोड़ का हिस्सा बनना चाहते हैं तो इस प्रस्ताव से सहमत होना चाहिए। यही हम प्रधानमंत्री को लिखे गए पर्यावरण मंत्री के लीक हुए पत्र और आस्ट्रेलियाई प्रस्ताव में समानता देख सकते हैं। उस पत्र में घरेलू कानून और कटौती का कार्रवाई की अंतरराष्ट्रीय जांच की बात की गई थी। हम इस प्रस्ताव को मान लेते हैं तो हम संधि करने वाले कहे जाएंगे। इसके लिए हम जी-77 देशों के समूह और चीन के खेमे से अपने को अलग करेंगे और ताकतवर प्रदूषणकर्ता देशों के गिरोह में शामिल हो जाएंगे।

क्या दुनिया के सबसे ज्यादा जलवायु विरोधी देश को साथ लेने की यह ‘व्यावहारिक’ नीति जलवायु परिवर्तन रोकने में कारगर होगी? स्पष्ट तौर पर नहीं? यह नीति उत्सर्जन रोकने, जिम्मेदारियों के समान वितरण के वैश्विक लक्ष्य को तय करने और सबसे ताकतवर देशों को बाध्य करने की प्रक्रिया के लिए हुए बहुपक्षीय समझौते को ध्वस्त कर देगी। खराब बात यह है कि यह उत्सर्जन कटौती की जिस स्तर की आवश्यकता है, उसके लिए कुछ नहीं करेगी। अमेरिका तैयार नहीं है और बाकी देश उसका पालन करने को तैयार हैं।


लेखिका सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की निदेशक हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पर्यावरण : ऐसे गठजोड़ से नहीं बदलेगी दुनिया