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विष्णुचित्त पेरि-आलवार

मदुरै के राजा बलदेव ऐसे संत की तलाश में थे जो सच्चा गुरु बन सके। उन्हीं दिनों तमिलनाडु के तिन्नेवेली जिले में विल्लीपुन्तूर नामक पवित्र स्थान में, मुकुन्दाचार्य नामक सदाचारी ब्राह्मण के यहां एक पुत्र ने जन्म लिया। यह बालक बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावाला था। उसका यज्ञोपवीत सातवें वर्ष में हुआ और नाम रखा गया विष्णुचित्त।

विष्णुचित्त अपना अधिकांश समय मंदिर में भगवान नारायण के रूप का ध्यान रखकर बिताते। कहा जाता है कि एक दिन विष्णुचित्त को स्वप्न में भगवान नारायण ने कहा- ‘तुम तुरंत मदुरै जाकर वहां के धर्मात्मा राजा बलदेव से मिलो। वहां सारे धर्मों के प्रतिनिधि एकत्र हुए हैं और राजा ने यह घोषणा की है कि जो पुरुष सच्चे आनंद की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ मार्ग बतलाएगा उसे उपहार रूप में कई भार सोना दिया जायेगा। तुम वहां जाकर प्रमाणित कर दो कि भगवान के रूप की उपासना ही आनन्द प्राप्त करने का एकमात्र सच्चा और सरल मार्ग है।’

विष्णुचित्त ने वहां धर्मसभा में कहा- ‘भगवान नारायण ही सर्वोपरि हैं और उनके चरणों में अपने को सर्वतोभावेन समर्पित कर देना ही कल्याण का एकमात्र उपाय है। भगवान नारायण ही हमारे रक्षक हैं, वे अपनी योगमाया से साधुओं की रक्षा और दुष्टों का दलन करने के लिए समय-समय पर अवतार लेते हैं। उन पर विश्वास करो, उनकी आराधना करो, उनके नाम की रट लगाओ और उनका गुणानुवाद करो- ‘ओम् नमो नारायणाय’।’ विष्णुचित्त के उस उपदेश का राजा के मन पर बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने उन्हें ही गुरु रूप में स्वीकार किया।

विष्णुचित्त ने अनेक पदों की रचना की। उन्होंने भगवत भक्ति के एक पद में कहा है- भगवान नारायण की जो लोग उपासना नहीं करते वे दया के पात्र हैं। उन्होंने अपनी माता को व्यर्थ ही प्रसव का कष्ट दिया। जो लोग नारायण नाम का उच्चरण नहीं करते वे पाप ही खाते हैं और पाप में ही रहते हैं। जो लोग भगवान माधव को अपने दृदय मंदिर में स्थापित कर प्रेम रूपी सुमन से उनकी पूजा करते हैं, वे ही मृत्युपाश से छूटते हैं।

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