अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

तपती धरती बढ़ता तनाव

कोपेनहेगन में चल रहे जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में जहां एक तरफ सारी दुनिया के नेता और पर्यावरणविद् एकजुट होकर प्रदूषण कम करने के लिए ऐजेंडा तैयार कर रहे हैं, वहीं जलवायु परिवर्तन लोगों में ट्रॉमा पैदा कर रहा है। मनोचिकित्सकों का मानना कि आदमी के लालच की वजह से बेतहाशा बढ़ा प्रदूषण दुनिया को तनावग्रस्त कर मानसिक रोग का शिकार बना रहा है जो चिंता का विषय है।

प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग करने की वजह से मानवजाति पर खतरे मंडरा रहे हैं। भौतिक सुख-सुविधाओं की लालसा में स्वयं ही मनुष्य ने खुद को इतनी विकट परिस्थितियों से घेर लिया है कि आज उसे स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी स्वच्छ हवा से महरूम होना पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन की मार के चलते लोगों में तनाव, गुस्सा और आक्रामकता की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह परिवर्तन कई तरह से व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक क्रियाओं पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।

मिजाज मौसम का और मूड इंसान का
यह सच है कि मन और स्वस्थ शरीर स्वस्थ वातावरण में ही बनता है। यदि पर्यावरण चक्र ही बिगड़ने लगे तो मौसम के मिजाज के साथ-साथ इंसान का मूड भी बदलने लगता है। वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख बताते हैं कि मौसम का मिजाज किसी भी व्यक्ति को मानसिक रूप से रोगग्रस्त कर सकता है। इसके सबसे ज्यादा शिकार अवसाद के मरीज होते हैं। दरअसल, मस्तिष्क के अंदर सेराटोनिन नाम का रसायन पाया जाता है जो न्यूरोट्रांसमीटर का काम करता है। ये न्यूरोट्रांसमीटर रसायन सूर्य की रोशनी में ही सक्रिय होते हैं पर इन दिनों रसायन का सक्रिय होना कम हो जाता है जिसके कारण लोगों में निराशा व चिंता के लक्षण अधिक बढ़ जाते हैं।

आमतौर पर किसी भी व्यक्ति के मूड में सामान्य दिनचर्या के दौरान भी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। बेशक, व्यवहार में तेजी और उदासी के पीछे दैनिक परेशानियां कारण हो सकती हैं। किंतु मौसम के संबंध में अवसाद की स्थिति वह होती है जब व्यक्ति के व्यावहारिक क्रियाकलापों और मानसिक स्थिति में परिवर्तन आता दिखाई देता है। अवसाद की यह स्थिति सामान्य से अधिक गंभीर होती है। यह लंबे समय तक बनी रहती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति के निजी और व्यावहारिक जीवन में मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं।

मनोवैज्ञानिक इस डिसॉर्डर के बढ़ते शिकारों के प्रति चिंतित हैं। दरअसल, व्यक्ति के विचारों, भावनाओं और क्रियाकलापों में आने वाला उतार-चढ़ाव जब बार-बार मौसम के चलते आता है तो इस मौसमी अवसाद को वातावरण से उपजे रोगों की गंभीर श्रेणी में खड़ा करना लाजिमी हो जाता है। इस बीमारी में न चाहते हुए भी व्यक्ति के व्यवहार में तीव्रता और हीनता आ जाती है। जिस पर उसका कोई बस नहीं रहता और इसके लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि कुछ भी चिंताजनक नहीं लगता।

यूं तो बदलते मौसम के साथ वातावरण में परिवर्तन आते ही हैं। इन परिवर्तनों के साथ शरीर के कुछ रासायनिक पदार्थ सामंजस्य नहीं बना पाते। इसलिए चिकित्सा विज्ञानी मानते हैं मेलोटोनिन, सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे प्रमुख रसायनों के स्नव में भारी कमी या वृद्धि के चलते भी यह रोग हो जाता है।

इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिकों की राय में आनुवांशिकता भी इस रोग का प्रमुख कारण है। यदि परिवार में पहले से ही इस बीमारी का कोई शिकार है तो उसकी संतान में यह प्रवृत्ति होने की संभावना बढ़ती है। मस्तिष्क में स्थित ग्रंथि जिसे पाइनल कहते हैं, से मेलाटोनिन नामक रसायन निकलता है जो मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर के निर्माण के नियंत्रण में सहायक होता है और इसका सीधा संबंध सूर्य की रोशनी से होता है। मेलाटोनिन रसायन का असर रोगी की नींद पर पड़ता है और इसकी कमी के कारण रोगी में नींद न आने की, बेचैनी, चिड़चिड़ापन तथा अकेलेपन की शिकायत बढ़ जाती है।

आक्रामकता
आज के भागदौड़ वाले समय में लोगों के पास व्यायाम का समय नहीं रह पाता जो कि बेहद जरूरी है। प्रदूषण की मार से शारीरिक रसायनों का स्नव तेजी से होने लगता है जिसके कारण कई बार असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। व्यक्ति को बार-बार और तेजी-से गुस्सा आता है।
  
इसमें अत्यधिक चिड़चिड़ापन, आक्रामकता और हड़बड़ी में रहने जैसे लक्षण दिखने लगते हैं। रोजमर्रा के कार्यो के प्रति उसकी दिलचस्पी कम हो जाती है। यहां तक कि उसे उसके पसंदीदा कार्यो में भी अरुचि होने लगती है। वह सदा आलस्य महसूस करना, एकाग्रचित न हो पाना, नकारात्मक सोच में डूबे रहना और स्वयं को नाकाबिल समझने लगता है।

प्राकृतिक आपदाओं का लोगों पर असर
जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाएं बढ़ी हैं जो कि पर्यावरणविदों को लिए गंभीर चिंता का विषय बन रहा है। हाल में इंडोनेशिया का भीषण भूकम्प और कोच्चिं की बाढ़ का कहर। जान-माल का जो भारी नुकसान सब को दिखता है, उससे भी बड़ी त्रसदी हादसे के बाद बच गए लोगों के भीतर अवसाद बनकर उन्हें उम्रभर सालती रहती है। वहां के नागरिकों को, जिन्हें भौतिक व मानसिक आघात लगता है, वे कई तरह की मनेविक्षिप्तता और सदमे के शिकार हो जाते हैं।
  
अपने नजदीकियों के खोने का दु:ख, भरपाई न होने वाली आर्थिक हानि आदि तमाम बातें गहरी ठेस पहुंचाती हैं और उनके व्यक्तित्व को उद्वेलित कर देती हैं। इस तरह का सदमा या आघात कई तरह की प्रतिक्रियाओं में दिखता है। हादसे का प्रारम्भिक असर तो प्रभावित क्षेत्र के लोगों पर पड़ता ही है। इस स्थिति को (पोस्ट डिजास्टर सिंड्रोम) कहते हैं। घटना के बाद सबसे पहले व्यक्ति आघात (ट्रॉमा) की स्थिति में आता है। खासकर प्राकृतिक विपदाएं तो लोगों को स्तंभित कर देती हैं जिन्हें डिजास्टर सिंड्रोम कह सकते हैं। चिकित्सकों की राय है कि इससे निजात पाने के लिए आसपास के वातावरण को स्वस्थ बनाना पहली जरूरत है। सोच को सकारात्मक चीजों की तरफ मोड़ना चाहिए। 

प्रदूषण ने बनाया लोगों को शार्ट टेंपर्ड
आप रोजाना आफिस के रास्ते में पड़ने वाले ट्रैफिक जाम से परेशान हो उठते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक प्रदूषण गुस्से को बढ़ाने में ट्रिगर का कार्य करता है जो कि ट्रैफिक जाम के दौरान देखा गया है। नित हो रहे आविष्कारों से प्रदूषण के स्नोतों में बढ़ोत्तरी हुई है। हवा में मौजूद टॉक्सिकेन्टस लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गया है। लोगों में आंख, नाक, कान, सांस संबंधी दिक्कतों के अलावा मानसिक परेशानियां जैसे गले में जलन, बेचैनी, थकान, सिर में भारीपन और मानसिक भ्रम की स्थिति देखी जा रही हैं। लोग शॉर्ट टेंपर्ड होते जा रहे हैं यानी जरा सी बात पर अपना आपा खोकर गुस्से में आ जाते हैं। यह उनका स्वभाव बन जाता है जिसकी वजह से न केवल वे ही दुखी रहते हैं बल्कि दूसरों को भी कष्ट पहुंचाते हैं।

जब किसी व्यक्ति को क्रोध आता है तो उसका चेहरा गुस्से में तमतमा उठता है, आंखें लाल हो जाती हैं, शरीर में कंपन होने लगता है, सांस फूलने लगती है और हृदयगति बढ़ जाती है। रक्तचाप खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है। क्रोध का असर व्यक्ति के तन और मन दोनों पर पड़ता है। चीखने-चिल्लाने से उसका गला बैठ जाता है। घबराहट, बेचैनी, पेट दर्द, सिरदर्द होने लगता है। इसका असर उसके पाचनतंत्र पर भी पड़ता है।

मनोवैज्ञानिक डॉ. अरुण कुमार के मुताबिक प्रदूषण की वजह से लोगों की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हुई है। मनोवैज्ञानिक तौर पर कमजोर लोगों को गुस्सा अधिक आता है जिसकी वजह से कई व्यावहारिक दिक्कतें जैसे गुस्सा, चिड़चिड़ापन सामने आ रहा है। जरूरत इस बात की है और सुबह कुछ समय पार्क में जाएं या पैदल चलें और प्राणायाम आदि करें।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:तपती धरती बढ़ता तनाव
दूसरा टी-20 अंतरराष्ट्रीय
भारत188/4(20.0)
vs
दक्षिण अफ्रीका189/4(18.4)
दक्षिण अफ्रीका ने भारत को 6 विकटों से हराया
Wed, 21 Feb 2018 09:30 PM IST
दूसरा टी-20 अंतरराष्ट्रीय
भारत188/4(20.0)
vs
दक्षिण अफ्रीका189/4(18.4)
दक्षिण अफ्रीका ने भारत को 6 विकटों से हराया
Wed, 21 Feb 2018 09:30 PM IST
तीसरा टी-20 अंतरराष्ट्रीय
दक्षिण अफ्रीका
vs
भारत
न्यूलैन्ड्स, केपटाउन
Sat, 24 Feb 2018 09:30 PM IST