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बिहार में मैला ढोने की प्रथा बदस्तूर जारी

केन्द्र की निष्क्रियता और बैंकों के उदासीन रवैया के कारण राज्य में मैला ढोने की प्रथा के  उन्मूलन की योजना हवा-हवाई हो गई है। इस घृणित कार्य को पूरी तरह खत्म करने की अवधि बार-बार बढ़ाए जाने से पूरी योजना पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।

हैरतअंगेज बात तो यह है कि सितम्बर में निर्धारित लक्ष्य से काफी पीछे छूट जाने के बाद इस कुप्रथा को खत्म करने की समय सीमा बढ़ाकर दिसम्बर तक कर दिया है। पूरे देश से इस प्रथा के उन्मूलन के बाद भी बिहार इसे ढोने को विवश है।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बिहार में मात्र 10 हजार लोग इस काम में जुड़े हैं और बिडम्बना यह है कि इतने लोगों की मुक्ति में भी सफलता नहीं मिल रही। राज्य में इसकी संख्या 15352 थी और लंबी जद्दोजहद के बाद 5288 लोगों को ही मुक्ति दिलाई जा सकी। यही नहीं अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण विभाग और अजाविनी भी हाथ-पांव मारने के अलावा कुछ नहीं कर पा रही।

विभाग के सचिव केपी रमैया स्वीकार करते हैं कि योजना का लाभ वास्तविकों तक नहीं पहुंच पाया है। उन्होंने कहा कि इसीलिए सरकार ने अपने स्तर से प्रयास शुरू किया है। सूत्र बताते हैं कि बैंकों से सहायता प्राप्त करने में इन्हें हर रोज दर-दर की ठोकर खानी पड़ती है। ऐसा तब है कि जब इस सहायता की गारंटी सरकार दे रही है।

राज्य सरकार ने बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं, बावजूद इसके बैंकों की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं। शुक्रवार को भी यह मामला एसएलबीसी की बैठक में अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण विभाग द्वारा उठाया गया। बैंकों को 6589 आवेदकों को सहायता राशि देनी थी लेकिन उसने मात्र 813 मामले ही निपटाए। बैंकों की गति देखकर अगले एक दशक में भी इसके उन्मूलन की संभावना नहीं दिखती।

विभाग के सचिव के.पी. रमैया स्वकार करते हैं कि इस कुप्रथा के उन्मूलन की योजना के कार्यान्वयन में कहीं न कहीं खामी है। हालांकि उन्होंने दावा किया कि इसे दूर करने की कोशिश की जा रही है।

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  • Web Title: बिहार में मैला ढोने की प्रथा बदस्तूर जारी