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1 अक्तूबर, 2020|9:52|IST

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मां के दामन में कूड़ा भर रहीं शहरी संतानें

महाकवि जयशंकर प्रसाद ने पूरे विश्वास के साथ लिखा था, ‘डरो मत अरे अमृत सन्तान, अग्रसर है मंगलमय वृद्धि, पूर्ण आकर्षण जीवन-केंद्र, खिंची आवेगी सकल समृद्धि’। मगर उनका भरोसा शहर के गंगातट पर टूट गया। जीवन-केंद्र बनी गंगा मइया की शहरी संतानें ही उसके साथ बदसूलकी में जुटी हैं। ऐसे में समृद्धि कहाँ दिखेगी?

माँ की सेवा का दिखावा करने वालों ने उसके हिस्से की जमीन कब्जा ली है। उस पर मकान बनाकर बस गए। वहीं शौच करते हैं। और, गंगा की कोख को कचरे को डम्प करते हैं। इस माँ का कर्ज नहीं चुकाने के लिए वे आगे नहीं आए, मगर अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए वहीं भैंसें बाँध लीं।

गंगा की आरती उतारने वाले साधू-सन्त तट पर जमे रोज तमाशा देखते हैं। मगर उदास माँ गंगा से आँखें मिलाने को कोई तैयार नहीं। न शहर के अफसर, न नेता, न पण्डा और न पुरोहित। अलबत्ता, अपनी समृद्धि की प्रार्थना करने वाली उसकी संतानें वहाँ रोज मेला लगाती हैं।

‘हिन्दुस्तान टीम’ ने गंगा बैराज से जाजमऊ तक दिल दुखाने वाले दृश्य देखे हैं। किसी घाट का ऐसा कोई हिस्सा नहीं, जहाँ कब्जा न किया गया हो। तट पर 300 मीटर से ज्यादा चौड़ाई और दस किलोमीटर लम्बाई का एक अनियोजित शहर बसा है। इसमें धर्मस्थल हैं और श्मशान घाट भी। यह गंगा की कोख पर ऐलानिया कब्जा है।

अफसरों ने कानपुर और बिठूर की महायोजनाएँ बनाईं। अपना मन किया तो भूप्रयोग के खिलाफ खड़ी व्यावसायिक बिल्डिंगों को नोटिस जारी किए और उनसे ‘खुश’ होकर बख्श दिया। मगर गंगा के किनारे एक अनियोजित शहर बसता रहा और अफसर गूंगे बने रहे। गंगा के तट पर पैदल चलने का रास्ता नहीं।

महिलाओं के स्नान, आरती के लिए बने घाटों पर लकड़ी के तखत नजर नहीं आते। तट पर तिमंजिले मकान खड़े हैं। उनके शौचालयों के पाइप गंगा में खोल दिए गए हैं। हजारों लोगों का कूड़ा पॉलीथीन में भरकर गंगा की ओर धकेला जा रहा है। गंगा बैराज पर नव ब्याहता जोड़ों को तट पर पूजा के लिए तो पानी मिल जाएगा, मगर परमट घाट में नहीं। वहाँ मंदिर से निकले फूल, साधुओं की रिहाइश की गंदगी रेत पर बिखरी है।

नंगे पाँव सीढ़ियों पर चल नहीं सकते। पानी इतना भी कम नहीं कि सीढ़ियों तक न आ पाए। मगर तट पर कूड़े के ढेर से ऊंचाई बढ़ गई है। लिहाजा, गंगा की धारा रूठकर निकल जाती है। मंदिर के बुर्ज रंग-बिरंगे हैं। रेत पर मवेशियों की बाजार है। नजर घूमेगी तो गोबर का पहाड़ नजर आएगा। उसके ऊपर चट्टे हैं, लोगों के घर और दुकाने हैं। वहीं सरकारी हैण्डपम्प गड़े हैं। कीमती सोडियम लाइट्स लगी हैं।

दरअसल, ये लाइट्स ही गंगा के सुन्दरीकरण का सरकारी सच है। इन पक्की इमारतों को किसने खड़ा होने दिया? यह सवाल बेमतलब नहीं है। इसे रोकने का जिम्मा नगर आयुक्त, केडीए उपाध्यक्ष का है। मगर गंगा तट पर बिना नक्शा, बिना स्वीकृति घर बने, मंदिर बने और अब सरसैया घाट पर गंगा की जमीन पर गुरुद्वारा बन रहा है।

कालीघाट पर सुअर बाड़ा बना है। पूरी आबादी का कूड़ा तट पर है, जिसे उठाने का इंतजाम नगर निगम ने नहीं किया। न कूड़ा फेंकने वालों पर जुर्माना। अस्पताल घाट के किनारे पहुँचिए। कोई 40 मीटर लम्बाई का कूड़े का पहाड़ लगा है। ग्रीन पार्क के निकट कुछ खूबसूरती नजर आएगी। यह बेतरतीब और गरीब बस्ती नहीं।

एक बिल्डर ने तट के सौन्दर्य को बाजार में बेचा है। फ्लैट बनाए और लोहे की ग्रिल से दूर तक गंगा की जमीन पर काबिज हो गया। ऐसे नजारे पूरी यात्रा में दिखे, जहां नाव घसीटनी पड़ी। और भी जहां पर्याप्त पानी था। मैगजीन घाट पर आम लोगों के लिए बने स्नानालय कब्जे में हैं। जाजमऊ के गंगापुल के किनारे तक टेनरियों की छीलन जमा कर दी गई है। पूरी आबादी तट पर है। डेढ़ दजर्न से अधिक ऐतिहासिक घाट सिर्फ खण्डर, अवशेष के रूप में हैं।

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