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ब्लॉग वार्ता : बेकरार बिहार और बिहारीनेस

बिहारीनेस। शब्द और अवधारणा दोनों स्तर पर यह जुमला बेजोड़ लगा। बिहार के लोग आजकल इन बातों से क्यों परेशान हैं। ज़माने तक बिहारी कहलाते रहे, लेकिन परेशान नहीं हुए। स्वीकार करते चले गए और काम करते चले गए। कहीं ऐसा तो नहीं कि समंदर के किनारे रहने वाले ठ अक्षर (राज एंड उद्धव) से शुरू होने वाले दो नेताओं की करतूतों के कारण नई पहचान की बेकरारी पैदा हो रही है। या फिर वाकई बिहार राष्ट्र की मुख्यधारा में अपनी खूबियों का प्रदर्शन करने के लिए तैयार हो रहा है।

खैर बिहारीनेस कहां से आई आप भी क्लिक कीजिए http://manojiofs.blogspot.com। मनोज कोई बड़े सरकारी अफसर मालूम पड़ते हैं। लिखते हैं कि आजकल मैं सभ्य दिखने लगा हूं। असभ्य तो पहले भी नहीं था पर दिखता नहीं था। दिल्ली हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही टैक्सी वाले ने सामान बेचने वाले बच्चे को डांट दिया.. कहा कि चल.बे. जा। बिहारी समझ बैठा है क्या? बस इस वाकये से मनोज के मन में बिहार दौड़ने लगता है। कहते हैं कि सरकारी नौकरी में कहां से कहां पहुंच गया। विभिन्न प्रांतों के रहन-सहन को सीखते-सीखते अपना बिहारीनेस दूर हो गया।

बस इसी शब्द ने आज ब्लॉग वार्ता बांचने का मुद्दा दे दिया। बिहारी होना क्या है? किसी बिहारी के मन में बिहार की कौन-सी तस्वीर है जिसे वो छुपाने बताने की कोशिश करता है। क्या दूर देश में मजदूरी से लेकर अफसरी करने गए बिहार के लिए ठा-ठा नेताओं की नेतागिरी के जवाब में क्षेत्रीयतावादी हो जायेंगे। चंडीगढ़ के स्कूल में मनोज का बेटा इसलिए स्कूल जाने से मना करता है कि दोस्त उसे बिहारी कहते हैं। बेटे को समझाने के बाद मनोज लिखते हैं कि मुझे कोई बिहारी कहता है तो बुरा नहीं मानता। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और रामधारी सिंह दिनकर को याद कर सीना चौड़ा हो जाता है। फिर मनोज बुद्ध से लेकर भोजपुरी, मैथिली, अंगिका, उर्दू, पाली, वज्जिका इत्यादि अनगिनत बोलियों को याद कर बिहार की विविधता पर गर्व करने लगते हैं। इस संकट का समाधान मनोज ही कर देते हैं। लिखते हैं कि मैं जो गिना रहा हूं वो सिर्फ बिहार का नहीं है। पूरे विश्व का है।

उन्नीस साल पहले जब दिल्ली आया था तो डीटीसी बस के ड्राइवर ने मुझे भी कहा कि ए बिहारी यहां उतर जा। मैं तो खुश हो गया कि अच्छा हमारी कोई पहचान भी है। बाद में पता चला कि व्यंग्य था। बिहार के लोग हमेशा इस सोच को नज़रअंदाज़ करते रहे हैं। स्थानीय आबोहवा में घुलते मिलते रहे हैं। यही असली बिहारीनेस है। अब डर लगता है कि कहीं यह पहचान बिहारीनेस की उदारता को संकीर्णता में न बदल दे। आजकल पटना से काफी बुलावा आता है। बिहार को लेकर सम्मेलन हो रहा है। दुनिया भर से काबिल बिहारी आ रहे हैं, इसलिए काबिल बिहारियों को अब वापसी के लिए अच्छा बिहार चाहिए। जहां विकास का रनवे बेहतर हो। वरना बिहारी वापसी से भागते रहेंगे। इससे बिहार को नुकसान ही होगा। मनोज की यह पंक्ति पसंद आ गई। हम तो उन्मुक्त उड़ना चाहते हैं।

लिखते हैं कि बिहारी तीन स्तर के होते हैं। एक बिहार में रहने वाला, दूसरा कमज़ोर आर्थिक तबके वाला जो बाहर मजदूरी करता है और तीसरा पढ़ा-लिखा पैसे वाला। मनोज लिखते हैं कि कुछ ऐसे बिहारी जिन्होंने अच्छा पद पा लिया, पैसे कमा लिये, अंग्रेजी सीख ली वे दिल्ली के टैक्सी चालकों की नजरों में बिहारी थोड़े ही हैं, वे अगर किसी को यह बताते हैं कि  ‘मैं बिहार से हूं’ तो सामने वाला ‘कोई मिल गया’ के ‘जादू’ की तरह उसे देखेंगे और एक बड़ा सा ‘अच्छा’.. बोलेंगे, फिर कहेंगे- ‘लगते तो नहीं।’

उत्तराखंड, झारखंड, उड़ीसा, पूर्वोत्तर और दक्षिण के राज्यों से आए लोगों से दिल्ली बस रही है और बदल रही है। बिहार के लोगों के पलायन का पैटर्न दूसरा है। ये देश भर में गए हैं। वहां जाकर घुल-मिल गए हैं। दिक्कत तब होती है जब कोई हताश होकर दिल्ली से इन पहचानों को अलग करने की कोशिश करता है। जैसे मुंबई में ठा-ठा द्वय कर रहे हैं।

संकीर्ण राजनीति करने वाले राज और उद्धव को संक्षिप्त नामों से ही पुकारा जाना चाहिए। बिहार के लोगों को संकीर्णता से बचना होगा। वर्ना मराठी राजनीति के कुछ हिस्सों की तरह बिहार में भी चंद लोग कुंठा की राजनीति की दुकान चमकाने लगेंगे। जिन समस्याओं के चलते लाखों लोग इसकी धरती को छोड़ कर गए, उसे दूर करने का आंतरिक साहस होना चाहिए। जब हम यह कर पाएंगे तभी संभावनाओं का इस्तेमाल कर सकेंगे। तभी हम बिहारीनेस को नई पहचान दे सकेंगे।

ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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