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तृष्णा और त्याग

कामनाओं का भी अंत नहीं है। तृष्णा की लगाम ढीली कर दी जाए तो ही हम परिवार, गाँव और देश से ऊपर उठकर पूरे विश्व पर राज करने की आकांक्षा रख सकते हैं। महाभारत में जीवन और जगत् से संबंधित विभिन्न विषयों पर पार्वती प्रश्न पूछती हैं। शिव विस्तार से उत्तर देते हैं।
  
तृष्णा के बारे में वे कहते हैं- ‘जो राजा अकेला ही पृथ्वी पर एकक्षत्र राज करता है, वह किसी एक ही राष्ट्र में निवास करता है। उस राष्ट्र में भी किसी एक ही नगर में रहता है। नगर के किसी एक घर और घर का एक कक्ष उसके लिए नियत है जिसमें एक ही शैया पर सोता है। शैया भी पूरी नहीं मिलती। आधे पर उसकी रानी सोती है। तो भी वह मूर्ख-गंवार सारे भूमण्डल को अपना ही समझता है और उसे सब ओर अपना ही बल दिखता है। प्रतिदिन सेरभर चावल से प्रत्येक मनुष्य का पेट भरता है (अब तो 250 ग्राम ही) उससे अधिक खाने वाला रोगग्रस्त होगा।’’

तृष्णा के समान कोई पाप नहीं और त्याग के बिना कोई सुख नहीं है। साथ ही यह भी सत्य है -‘तृष्णा न जीर्णा वय मेव जीर्णा।’ तृष्णा कभी बूढ़ी नहीं होती। शरीर की शक्तियां चूक जाने पर भी जर्जर शरीर में तृष्णा जीवित रहती है। हमारी लोक-कथाओं और उपाख्यानों में ऐसी बहुत-सी कहानियां हैं जो अतिलोभी मनुष्य की दुर्दशा दर्शाती हैं। पर हम हैं कि मानते ही नहीं। पर इसी समाज में कुछ लोग इसके विपरीत भी मिलते हैं। उनका भी कहना है कि सारी पृथ्वी हमारी है।

सारा बैंक, लॉकर, दुकान, मॉल, सब अपना है। पर मैं दो रोटी खाता हूं, एक कमीज़-पैंट पहनता हूं। उनकी रक्षा की चिंता किए बिना सुख की नींद सोता हूं। जीने की यह सोच और तरीका भी सुख देता है। आनंद भी। ऐसे लोग अकर्मण्य नहीं होते। कर्म करके दो जून की रोटी, तन ढकने लायक कपड़ा कमाते हैं।

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