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सहयोग की ऊर्जा

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की रूस यात्रा के दौरान जिस तरह के समझौते हुए उनसे दो बातें साफ होती हैं। पहली यह कि भारत-रूस मैत्री शीतयुद्ध के काफी आगे निकल आई है और नए आर्थिक-राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में उसके नए आयाम स्पष्ट हो रहे हैं। दूसरी यह भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के बाद परिस्थितियां वैसी ही अनुकूल हो रही हैं जैसी कि उम्मीद थी। भारत और रूस के बीच जो परमाणु सहयोग समझौता हुआ है, वह 123 समझौते से बहुत आगे है, लेकिन यह संभव इसलिए हो पाया कि 123 समझौते ने आगे बढ़ने के दरवाजे खोल दिए हैं।

जाहिर है कि भारत और उससे परमाणु क्षेत्र में समझौता करने वाले देशों की निगाहें 123 समझौते की बंदिशों पर नहीं बल्कि संभावनाओं पर हैं और आइंदा पूरी-पूरी उम्मीद है कि परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आगे आने वाले करार और भी ज्यादा फायदेमंद होंगे। रूस वैसे भी भारत को टैक्नॉलोजी या ऐसे ही दूसरे क्षेत्रों में मदद के लिए सबसे आगे रहा है। शीतयुद्ध के जमाने में ऐसा इसलिए था कि अमेरिका, चीन और पाकिस्तान के त्रिकोणीय मुकाबले में मजबूत भारत रूस के हित में था। अब परिस्थिति बदली है, अब रूस एक पूर्व महाशक्ति है जिसके पास सामरिक या तकनीकी शक्ति तो बहुत है, लेकिन जो आर्थिक रूप से अमेरिका, चीन या यूरोप का मुकाबला नहीं कर सकता।

भारत एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति है जिसे रक्षा या ऊर्जा टैक्नॉलोजी और साधन बेच कर रूस की अर्थव्यवस्था को फायदा होता है और भारत को वे चीजें उन आसान शर्तो पर मिल जाती हैं जो पश्चिमी देश उसे नहीं देते। मसलन रक्षा उपकरण बेचने में अमेरिका लगातार जांच और उनके अंतिम रूप से इस्तेमाल को लेकर कई शर्ते लगाता है जो रूस के साथ सौदों में नहीं होतीं। कई मायनों में अमेरिका का भारत से रिश्ता पुराने जमाने के संदेहों और रणनीति से पूरी तरह उबर नहीं पाया है, इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि अब भी रक्षा मामलों में सबसे ज्यादा व्यापार हम रूस के साथ ही करते हैं।

परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी 123 से आगे बढ़ने का काम भारत-रूस समझौते में ही हुआ। हालांकि परमाणु ऊर्जा की व्यावहारिक उपयोगिता अब भी बहुत स्पष्ट नहीं है, लेकिन विश्व राजनीति में इसका रणनीतिक राजनैतिक महत्व बहुत ज्यादा है। भले ही कुछ लोग इस पर थोड़े नाखुश हैं कि रूस हमें परमाणु हथियार संपन्न शक्ति मानने को तैयार नहीं है लेकिन एनपीटी पर अगले साल पुनर्विचार होना है।

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