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टेनरियों ने जहरीली कर डाली गंगा

गोस्वामी जी ने गंगा के लिए लिखा ‘दरस, परस, मज्जन अरु पाना’। पर आज की गंगा आचमन और स्नान तो दूर स्पर्श करने लायक भी नहीं रही। टेनरियों के वेस्ट और सीवर ने गंगाजल को जहरीला बना दिया। चमड़े के कारोबार में इस्तेमाल होने वाला क्रोमियम नालों के जरिए बिना ट्रीटमेंट के ही गंगा में उड़ेला जा रहा है।

ट्रीटमेंट प्लांट तक गंदे पानी को पहुँचाने के लिए डाली गई सीवर लाइन की क्षमता ही एक तिहाई है। ऐसे में सीवर लाइन फट गई है, उफान मारता गंदा पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। और तुर्रा ये है कि ट्रीटमेंट प्लांट के इस हिस्से को चलाने के लिए दो वर्ष से नगर निगम ने अपना शेयर नहीं दिया। अलबत्ता जिम्मेदार अफसरों ने गंगातट पर टेनरियाँ खोलने की एनओसी देने में जरूरत से ज्यादा दरियादिली दिखायी।

हाईकोर्ट के आदेश पर टेनरियों में जिस प्राइमरी ट्रीटमेंट प्लांट की तफ्तीश शुरू हुई है, उनसे निकला पानी ट्रीटमेंट प्लांट तक ले जाने की क्षमता ही इस शहर में नहीं बढ़ाई गई। अफसर झूठ पर झूठ बोलते रहे और 402 टेनरियाँ गंगा तट पर अनियोजित तरीके से खुल गईं।

मसला उच्च अदालत तक पहुँचा तो  उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, इंडस्ट्री और नगर निगम के अफसर हवाई योजनाओं में लगे रहे। कुछ शातिर लोगों की कारस्तानियों और बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच टेनरियों के माथे पर गंगा को मैला करने का कलंक चस्पा है।

प्रदेश की उच्च अदालत में गंगा की सफाई पर हुए दावों पर उंगली उठाई गई तो एक फिर कानपुर शहर की टेनरियों का मंथन शुरू हुआ है। बेसिक क्रोम सल्फेट से चमड़े की टेनिंग करने वाली टेनरियों से निकलने वाले गंदे पानी का प्राइमरी ट्रीटमेंट करने की व्यवस्था टेनरियों के हवाले है।

हिन्दुस्तान टीम ने देखा कि अनियोजित टेनरियों के बीच उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष अनिल मिश्र खुद पहुँचे तो टेनरियों का नाम-पता खोजना मुश्किल था। घरों के बीच टेनरी और  टेनरियों के अंदर रिहाइश। यह घालमेल पिछले 23 साल में खत्म नहीं हो पाया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एडीशनल सेक्रेट्री जेएस यादव ने यह सच स्वीकार किया।

उन्होंने कहा कि टीमें इस बार डिटेल रिपोर्ट तैयार करने में लगी हैं। अलबत्ता इस बीच 37 टेनरियाँ सील की गईं। मगर बुनियादी बदलाव नहीं दिखा। टेनरी का जहरीला पानी ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुँचाने के लिए शीतला बाजार, वाजिदपुर में बने पम्पिंग स्टेशन ठप हैं। नौ करोड़ लीटर क्षमता वाली सीवर लाइन जाम, फटी हुई और उफान मार रही है।

गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के वरिष्ठ अधिकारी ने दबी जबान सच स्वीकारा। कहा कि नई टेनरियाँ बिना इजाजत के खुल गईं। इनको प्रदूषण बोर्ड ने अनापत्ति कैसे दी? 170 टेनरियों के लिए नौ करोड़ लीटर क्षमता का ट्रीटमेंट प्लांट बना था और 402 टेनरियाँ हो गईं। लिहाजा ट्रीटमेंट की व्यवस्था ध्वस्त पड़ी है। घरों में छोटी-छोटी सैकड़ों टेनरियाँ हैं जो संज्ञान में नहीं ली गईं। पूरे जाजमऊ, वाजिदपुर में घरेलू लाइन में टेनरियों का सीवर मिला दिया।

जिलाधिकारी अनिल सागर ने जल संस्थान से ऐसे 37 कनेक्शन काटने के लिए कहा भी, मगर उसका अमल नहीं हुआ। जाजमऊ क्षेत्र में 65 करोड़ लीटर से अधिक खतरनाक गंदा पानी गंगा में उड़ेला जा रहा है। इसकी तस्दीक इस बात से हो जाती है कि जेएनएनयूआरएम में यहां पर 65 करोड़ लीटर क्षमता का नया ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाने की पैरवी की गई है।

क्रोमियम के दुष्प्रभाव का सर्वप्रथम अध्ययन करने वाले एक्टिविस्ट राकेश जायसवाल ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और टेनरी संचालकों के बीच नूरा-कुश्ती की गई है। कोर्ट के सामने सही तस्वीर नहीं पेश हो पाई। गंगा एक्शन प्लान के प्रथम चरण के बाद कोई ठोस परिवर्तन नहीं हुआ। सिर्फ जाँच का दिखावा हुआ।

10 करोड़ रुपए वार्षिक खर्च करके सीवर और क्रोमियम के पानी को ट्रीट करने के नाम पर घपला हुआ सो अलग। अब कानपुर से भागी टेनरियाँ उन्नाव और बंथर के निकट गंगा में अपनी गंदगी उड़ेलने में लगी हैं।

पीपुल फॉर पीपुल के उपाध्यक्ष केदार नाथ ने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हो चुका है कि जाजमऊ एरिया के ग्राउंड वाटर में 120 फिट गहराई तक क्रोमियम जैसा खतरनाक रसायन है जो गर्भपात, कैंसर और चर्मरोग पैदा करने में लगा है। गंगा की लहरों में यही क्रोमियुक्त गंदा पानी कौन सा मोक्ष दिलाएगा? 

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