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जल-जंगल और जमीन के लिए लड़ती दयामणि

जल-जंगल और जमीन के लिए लड़ती दयामणि

हममें से बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो तमाम ऊंची डिग्रियां हासिल करने के बाद भी वह नजर हासिल नहीं कर पाते, जो समाज के गरीब व वंचित तबकों का सुख-दुख देख सके। और हमारे ही बीच कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो लोगों के हक के लिए अपना पूरा जीवन लगा देते हैं। झारखंड के गुमला जिले के अरहरा गांव की रहने वाली दयामणि बारला ऐसी ही महिला हैं। कहने को तो वह रांची क्लब रोड पर चाय की दुकान चलाती हैं, जिससे उनकी आजीविका चलती है। पर वास्तव में वह ‘आदिवासी मूलवासी अधिकार संगठन’ की संयोजक का पदभार संभाले हुए हैं। यह संगठन झारखंड के आदिवासियों के अधिकारों की आवाज उठाने के लिए बनाया गया है।

इस इलाके के विकास के नाम पर जो सरकारी नीतियां बनाई गई हैं, उसकी कीमत स्थानीय आदिवासियों को अपने जंगल-जमीन से बेदखल होकर चुकानी पड़ी है। सदियों से जल-जमीन-जंगल पर निर्भर ये आदिवासी न तो शहरों की बोली जानते हैं और न वहां जीवन जीने के तौर -तरीके। अपनी जमीन से विस्थापित होकर जब ये शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर किए जाते हैं तो इन्हें वहां कोई सम्मानजनक रोजगार नहीं मिलता। औरतें जहां बेहद कम तनख्वाह पर लोगों के घरों में काम करने को मजबूर होती हैं, वहीं मर्दो को मजादूरी व रिक्शा चालकों तक का काम भी बहुत मुश्किल से मिलता है। यही वजह है कि दयामणि ने इन सरकारी नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है।

दयामणि एम. कॉम. तक पढ़ी हैं। बचपन में ही मां-बाप की जमीन गांव के सबल लोगों ने हथिया ली तो परिवार को विस्थापितों का जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा। बचपन में ही विस्थापन का दर्द ङोल चुकी दयामणि ने विस्थापितों के संघर्ष को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। दयामणि का परिवार गरीब था और उन्हें पढ़ा नहीं सकता था, इसलिए उन्होंने रांची में घरेलू नौकरानी का काम किया और मैट्रिक की पढ़ाई की।

आगे की पढ़ाई ट्यूशन पढ़ा कर पूरी की। इसके बाद एक संस्था में दो साल तक काम किया, पर जल्दी ही उन्होंने इस संस्था को छोड़ दिया। उन्होंने तय किया कि वह किसी संस्था में नौकरी करने की बजाय जनांदोलन से जुड़ेंगी और लोगों के हक की लड़ाई में हाथ बंटाएंगी।

यह वह समय था, जब बिहार में कोयलकारो हाइडेल आंदोलन जन्म ले रहा था। पी. वी. नरसिंह राव की तत्कालीन केंद्र सरकार ने तय किया था कि 5 जुलाई 1995 में ‘कोयलकारो परियोजना’ का शिलान्यास किया जाएगा। यह इस संगठन की ही शक्ति थी, जिसने सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और उसे इस परियोजना से पीछे हटना पड़ा। तब से प्रतिदिन इस दिन को ‘संघर्ष दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। दयामणि ने आंदोलन को मजबूत करने के लिए कलम की ताकत को भी साथ जोड़ा। उन्होंने बिहार से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘प्रभात खबर’ में लिखना शुरू किया। ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाली दयामणि को ‘काउंटर मीडिया अवॉर्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है। इसके बाद उनके लिए लोगों की आवाजों को शब्दों में ढालने का काम सरल हो गया। वह गांव-गांव घूमतीं, लोगों की समस्याएं सुन कर उन्हें शब्दों में ढालतीं और अखबार के पन्नों तक पहुंचा देतीं। यदि कोई संपादक लोगों के इन मुद्दों को तरजीह देने में कोताही करता तो उसे खरी-खोटी भी सुना आतीं।

जब एन. डी. ए. सरकार सत्ता में थी तो उसने 68 बड़ी कंपनियों के साथ एक समझौता किया था, जिसमें एनएच 33 के दोनों ओर पांच किमी की भूमि को विशेष आर्थिक क्षेत्र अर्थात ‘सेज’ बनाने के लिए अधिग्रहित किया जाना था। इससे कई लाख आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ता। दयामणि ने अपने संगठन के जरिए इसका विरोध किया और उनकी लड़ाई आज भी जारी है।

झारखंड के सुदूर आदिवासी गांव में जन्मी दयामणि का आत्मविश्वास देखते ही बनता है। वह न केवल देसी, बल्कि विदेशी मंचों से भी अपनी आवाज उठा रही हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि एक दिन तो ऐसा आएगा, जब आदिवासियों को उनके जंगल और जमीन पर अधिकार वापस मिलेगा।

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