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सवाल महिलाओं की सुरक्षा का

सवाल महिलाओं की सुरक्षा का

दिल्ली में महिलाएं कितनी असुरक्षित हैं, यह अब किसी से छिपा नहीं है। लड़कियों से छेड़छाड़, बलात्कार, अपहरण, उनके चेहरों पर तेजाब फेंके जाने की घटनाएं अब आम हो चुकी हैं। यही नहीं, अपराधी प्रवृत्ति के लोग वृद्ध महिलाओं तक के साथ हिंसा करने से नहीं चूकते। अभी पिछले दिनों की ही घटना है। एक वृद्घ महिला टैक्सी में जा रही थी। उसने टैक्सी चालक से टैक्सी धीरे चलाने के लिए कहा। इस पर टैक्सी धीमी करने की बजाय टैक्सी चालक ने महिला के साथ बुरी तरह मारपीट की। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। ना सड़क पर, ना ऑटो में और ना टैक्सी में। हालांकि महिलाओं की असुरक्षा को लेकर लंबे समय से बहस-मुबाहिसे किये जा रहे हैं, लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकलता। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का बयान कि लड़कियों को देर रात घर से नहीं निकलना चाहिए, स्थिति को और भी गंभीर बना देता है। शायद वह महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सचमुच चिंतित भी हैं। संभवत: इसी का परिणाम है महिलाओं की सुरक्षा के लिए दिल्ली सरकार की पहल।
दिल्ली की महिला एवं बाल विकास तथा स्वास्थ्य कल्याण मंत्री किरण वालिया ने सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा को रोकने और महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए पिछले दिनों इस अभियान की बाकायदा शुरुआत की। इस अभियान का मकसद महिलाओं को हर तरह से सुरक्षा प्रदान करना है और खासकर ऐसी महिलाओं को, जो देर रात तक बाहर रहती हैं और लोगों के घरों में काम करती हैं। ऐसा नहीं है कि इस तरह के अभियान पहले नहीं चलाये गए, लेकिन इतने बड़े स्तर पर ऐसा अभियान पहली बार चलाया जा रहा है, जिसमें महिलाओं की हर स्तर पर सुरक्षा की जायेगी। इस तरह के अभियान की पहल का एक कारण कॉमन वेल्थ गेम्स को भी माना जा रहा है, ताकि विदेशी मेहमानों के  सामने भारत की नकारात्मक तस्वीर ना जाए। बकौल किरण वालिया, ये तो सभी जानते हैं कि महिलाओं पर होने वाले अपराधों को रोकने के लिए कई कानून बनाये गए हैं, यहां तक कि दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं के प्रति होने वाले यौन उत्पीड़न को रोकने के भी प्रयास किए गए। लेकिन ये सब पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए। आज भी दफ्तरों में महिलाएं यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं। इतना ही नहीं, रात के समय तो महिलायें खासतौर पर सुरक्षित नहीं हैं। किरण वालिया ने बताया, महिलायें रात को भी निडर आ-जा सकें, इसके लिए हम कुछ सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं के साथ मिल कर एक ऑडिट तैयार करवा रहे हैं, जिससे ये एनजीओ सही परिस्थितियों पर फोकस कर सकें कि किन जिलों में लाइटें नहीं हैं, सड़कों पर अंधेरा कहां अधिक होता है, शौचालयों का कहां-कहां अभाव है, कौन-कौन से रास्ते अधिक सुनसान हैं, किन पाकरें में लाइट नहीं है। इन छोटी-छोटी चीजों को ध्यान में रख कर ही महिलाओं को हम सुरक्षा दे पायेंगे। उन्होंने आगे बताया, और रही बात दिल्ली की तो हम उन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देंगे, जहां गरीबी ज्यादा है या यूं कहें कि जहां माता-पिता दोनों काम करते हैं और बच्चाियां घरों में अकेले रहती हैं। स्लम एरिया को हम ज्यादा महत्त्व देंगे, क्योंकि वहां बच्चियां पढ़ी-लिखी नहीं होती। एनजीओ के अलावा हम दिल्ली परिवहन निगम, पुलिस, एमसीडी, एनडीएमसी और उन लोगों की मदद लेंगे, जो सरकार की ओर से निर्माण कार्य करती हैं। रही बात पुलिस की तो पुलिस इसमें पूरा सहयोग करेगी और पीड़ित महिलाओं की रिपोर्ट आसानी से लिखेगी। इस अभियान का मकसद समाज में चेतना का प्रचार-प्रसार करना और महिलाओं को सुरक्षित माहौल प्रदान करना है। किरण वालिया तो यहां तक कहती हैं कि वे कोशिश कर रही हैं कि डीटीसी बसों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं, जिससे कोई भी परेशानी होने पर महिलाओं को तुरंत राहत मिल सके । गौरतलब है कि दिल्ली में ऐसे बहुत से इलाके हैं, जो रात में सुनसान हो जाते हैं, जहां न तो स्ट्रीट लाइट्स हैं और न ही दूर-दूर तक कोई पुलिस बूथ। हाइवे, न्यू दिल्ली रेलवे स्टेशन, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन, रिंग रोड, मूलचंद, साउथ एक्स, सीलमपुर, ऐसे ही कुछ इलाके हैं, जहां महिलाओं का रात में अकेले निकलना मुश्किल है।


यह सच है कि महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा की समस्या की कोई भौगोलिक सीमा नहीं है, बल्कि ये समस्या भारत के सभी क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं की समस्या है और इस समस्या से लड़ने के लिए सिर्फ किरण वालिया या गैरसरकारी संस्थाओं ही नहीं, बल्कि आम आदमी को भी अपनी भागीदारी देनी होगी और खासकर आज का युवा वर्ग इस तरह के अभियानों में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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