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नंबर वन खेल के सिकंदर हम

यह किस्सा बहुत से क्रिकेट प्रेमियों को मालूम होगा, लेकिन यहां फिर से दोहराने में हर्ज नहीं है। भारतीय टेस्ट टीम जब 1936 के पहले अधिकारिक दौरे पर इंग्लैंड में खेलने गई तब इसके कप्तान महाराजा विजयनगरम उर्फ विज्जी थे। वे शायद क्लब स्तर के खिलाड़ी रहे होंगे लेकिन वे कप्तान इसलिए थे कि राजा थे और टीम का कुछ खर्च भी वे ही दे रहे थे। आम राय यह थी कि अपने जमाने के सबसे बड़े खिलाड़ी कर्नल सी.के.नायडू को कप्तान बनाया जाना चाहिए था। विज्जी के टेस्ट स्तर के खिलाड़ी न होने से उनका टीम में कुछ दबदबा भी नहीं था।

विज्जी ने टीम पर अपना राज स्थापित करने के लिए पुरानी रणनीति यानी फूट डालने का इस्तेमाल करने की सोची। उस रणनीति के तहत वे ओपनिंग बल्लेबाज विजय मर्चेट और मुश्ताक अली से अलग अलग मिले। उन्होंने मर्चेट से कहा कि चूंकि वे पारसी हैं और मुश्ताक मुसलमान इसलिए मुश्ताक उन्हें रन आउट करवाने की कोशिश करेंगे। ऐसी ही बात उन्होंने मुश्ताक अली से भी कही कि मर्चेट उन्हें रन आउट करवाने वाले हैं। मुश्ताक पहली पारी में रन आउट हुए थे इसलिए विज्जी को लगा होगा कि उनकी चाल कामयाब हो जाएगी। मर्चेंट और मुश्ताक जब बाद में मिले तो उन्होंने आपस में तय किया कि कुछ भी हो,हमें रन आउट नहीं होना है। यह ओल्ड ट्रैफोर्ड में खेले गए दूसरे टेस्ट मैच की बात है। मर्चेट और मुश्ताक ने दूसरी पारी में 203 रन की भागीदारी की, दोनों खिलाड़ियों ने शतक बनाया और भारत वह मैच ड्रा करवा गया।

भारत ने अभी-अभी टेस्ट मैचों में सौवीं जीत हासिल की है और वह पहली बार टेस्ट रैंकिंग में पहले नंबर पर पहुंच गई है। पिछले बरसों में क्रिकेट का स्वरूप बदल गया है और अब हर तरह से उसकी निर्भरता भारतीय जनता के क्रिकेट प्रेम और यहां के फलते फूलते उद्योगों के खजानों की खुली थैलियों पर बढ़ गई है। अब क्रिकेट ऐसा खेल है जिसके बारे में समाजशास्त्री आशीष नंदी का कहना है कि वह एक भारतीय खेल है जो संयोगवश इंग्लैंड में आविष्कृत हुआ था। क्रिकेट एक भारतीय खेल है इसका प्रमाण यह है कि भले ही हम आज नंबर एक हो गए हों लेकिन लंबे वक्त तक हम हारते ही रहे, तब भी भारत में क्रिकेट लोकप्रिय था। दो साल पहले हम एक दिवसीय विश्व कप के शुरुआती दौर में ही बाहर हो गए थे, लेकिन थोड़े-बहुत गुस्से के बाद भारतीय दर्शक फिर क्रिकेट की ओर लौट आए।  पहला टी-20 विश्व कप जीतने के बाद दूसरे में हम कोई तीर नहीं मार सके, लेकिन क्रिकेट प्रेमी क्रिकेट से चिपके रहे।

और इन क्रिकेट प्रेमियों में सिर्फ स्टेडियम में भारत का झंडा लिए शोर मचाते लोग नहीं हैं। दर्शनशास्त्री रामचंद्र गांधी क्रिकेट के जबर्दस्त प्रेमी थे, उनके दादा महात्मा गांधी को भी क्रिकेट पसंद था। लता मंगेशकर क्रिकेट प्रेमी है। मार्क्सवादी अर्थशास्त्री अशोक मित्र की छवि यूं तो एक तुनकमिजाज, ईमानदार और विद्वान बूढ़े की बनती है लेकिन अगर उनके लेखन में लालित्य और रस देखना हो तो क्रिकेट पर उनके लेख पढ़ने चाहिए। आशीष नंदी का जिक्र पहले आ ही चुका है।

मराठी उपन्यासकार ना.सी. फड़के ने लिखा है कि लंबे, छरहरे मुश्ताक अली जब मैदान में उतरते थे तो कैसे मैदान में जॉर्जेट की साड़ियों के पल्लू और तरह तरह की खुशबुएं हवा में लहराने लगती थीं यानी उस जमाने से यह क्षेत्र भी क्रिकेट प्रेमियों की जमात में शामिल था। और हम जैसे आम लोग तो थे ही इस खेल के प्रेमी।
शुरू की मर्चेट और मुश्ताक वाली घटना से यह तो पता चलता ही है कि क्रिकेट तब भी भारतीयता के सांप्रदायिकता, जातिवाद, वर्गभेद वगैरा से ऊपर के आदर्शो से जुड़ने की प्रक्रिया में था और आज भी वह आज के भारत का प्रतीक है।

सौरव गांगुली और उनके बाद कोई कप्तान ऐसा नहीं हुआ, जिस पर हम प्रांतीय या क्षेत्रीय भेदभाव का आरोप लगा सकें। सचिन तेडुलकर पर तो शिवसेना ने आरोप भी लगाया है कि उन्होंने मराठी खिलाड़ियों को टीम में रखने के लिए कुछ नहीं किया। हमारी टीम के ज्यादातर खिलाड़ी क्रिकेट के परंपरागत केंद्रों से नहीं हैं, झारखंड, केरल जैसे राज्यों से और मेरठ, अहमदनगर जैसे कस्बों से हैं। ज्यादातर खिलाड़ी औसत या निम्न आयवर्ग से आए हैं और क्रिकेट ने उन्हें अमीर बना दिया है। सैकड़ों ऐसे खिलाड़ी हैं जो गरीबी से आए, लेकिन क्रिकेट ने उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का हम दिया।

महत्वपूर्ण यह है कि आज भारत आर्थिक रूप से और खेल की दृष्टि से भी क्रिकेट का पॉवरहाउस है। क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की भूमिका इसमें कुछ काले-सफेद के बीच हैं लेकिन असली ताकत भारत की युवा पीढ़ी की है, जिसके प्रतीक धोनी और सहवाग हैं। यह पीढ़ी है जिसकी वजह से दुनिया में यह कहा जा रहा है कि विश्व अर्थव्यवस्था के आगे बढ़ने की कुंजी भारत में है। यह पीढ़ी हमारी पिछली पीढ़ियों के किए अच्छे-बुरे पर कुढ़ने की बजाय उसके बावजूद कुछ बेहतर करने का हौसला लिए है। आखिरकार यह तो साफ है कि क्रिकेट में ज्यादा पैसा एक दिवसीय क्रिकेट और टी-20 में है और टेस्ट क्रिकेट को किस तरह बचाएं ऐसे सवाल खड़े किए जा रहे हैं। लेकिन भारत-श्रीलंका की टेस्ट सीरीज ने यह भी सिद्ध किया कि भारतीयों का जोश टेस्ट क्रिकेट के लिए भी है और कार्पोरेट्स का पैसा भी इस जोश के पीछे-पीछे आएगा ही।

हमारा क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पैसे के पीछे लगा हुआ है, इसलिए वह टेस्ट की बजाय एक दिवसीय और टी-20 ही खिलवा रहा है, लेकिन फिर भी भारतीय टीम टेस्ट में नंबर एक पर पहुंच गई, जबकि बाकी टीमें उससे ज्यादा टेस्ट खेलती हैं। और टेस्ट क्रिकेट में दिलचस्पी के लिए वीरेंदर सहवाग से बड़ा कौन सा प्रतीक होगा, जो एक दिन में पौने तीन सौ रन बना डाले। वीरेंदर सहवाग की बल्लेबाजी कौन से क्रिकेट कोचिंग मैन्युअल में फिट बैठती है, कोई बतलाए? यह बात और है कि हमारे क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने ऐसी प्लानिंग की है कि भारत ज्यादा दिन तक रैंकिंग में नंबर एक नहीं रहेगा, क्योंकि आने वाले दिनों में हम सिर्फ बांग्लादेश से टेस्ट खेल रहे हैं, जिससे जीतने पर भी हमें ज्यादा अंक नहीं मिलेंगे। फिर भी भारतीयों के लिए तो यह खेल नंबर एक रहेगा ही। इसकी वजह यह है कि भारतीयों में यह विश्वास पैदा हो गया है कि वे नंबर एक हो सकते हैं। भारतीयों की नई पीढ़ी में वह असुरक्षा के संशय नहीं हैं, जो पिछली पीढ़ियों में थे, उनसे उबरने की एक लंबी प्रक्रिया में हम उस जगह आए हैं जहां हमारे नौजवान सहज ही भरोसा कर सकते हैं कि भले ही छोटे-मोटे झटके लगते रहे, हम नंबर एक हैं।  इसलिए हमें भी इन संशयों को फटकार कर इस खुशी के मौके पर खुले दिल से प्रशंसा में तालियां बजानी चाहिए।

लेखक हिन्दुस्तान में एसोशिएट एडिटर हैं

rajendra.dhodapkar@hindustantimes.com

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