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मूल समस्याएं

जब व्यक्ति अपने आपको नहीं देख पाता, तब हजारों समस्याएं पैदा हो जाती हैं। इनका कहीं अंत नहीं आता। गरीबी की समस्या हो या मकान और कपड़े की समस्या हो या अन्य समस्याएं हों, वे सारी की सारी गौण समस्याएं हैं, मूल समस्या नहीं है।  ये पत्तों की समस्याएं हैं, जड़ की नहीं हैं। पत्तों का क्या? पतझड़ आता है, सारे पत्ते झड़ जाते हैं। वसंत आता है और सारे पत्ते आ जाते हैं, वृक्ष हरा-भरा हो जाता है। यह मूल समस्या नहीं है। मूल समस्या यह है कि व्यक्ति अपने आपको नहीं देख पा रहा है। उसके पीछे ये पांच कारण या समस्याएं काम कर रही है- पहली मिथ्या दृष्टिकोण, दूसरी असंयम, तीसरी प्रमाद, चौथी कषाय, पांचवीं चंचलता।

जैन दर्शन ने बताया कि मूल समस्याएं ये पांच हैं। यही वास्तव में दु:ख है। यही दु:ख का चक्र है। जब तक इस दु:ख के चक्र को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक जो सामाजिक, मानसिक और आर्थिक समस्याएं हैं, उनका सही समाधान नहीं हो पाएगा। एक प्रश्न है कि आदमी करोड़पति है, अरबपति है। वह अप्रामाणिक और अनैतिक व्यवहार करता है। क्या वह बुराई गरीबी के कारण करता है? अभाव के कारण करता है? रोटी-रोजी के लिए करता है?

गरीब आदमी इतना अनैतिक नहीं होता, जितना अनैतिक एक धनी और अमीर आदमी होता है। समस्या धन की नहीं है। समस्या लोभ की है। यह सबसे बड़ी समस्या है। इसका समाधान नहीं खोजा जाता। समाधान खोजा जाता है गरीबी का। वह कभी समाप्त नहीं होती। कुछ लोग बहुत धनी हो जाते हैं और कुछ अत्यधिक गरीब रह जाते हैं। जब पहाड़ है तो वहीं गड्ढा अवश्य होगा। ऊंचाई है तो निचाई भी होगी। सर्वत्र समतल हो नहीं सकता। क्या समानता हो सकती है? यह असंभव नहीं है। पर जब तक मूल समस्या पर ध्यान नहीं जाता, तब तक समस्या का समाधान नहीं मिल सकता।

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