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संसद में लिब्रहान रिपोर्ट पर बहस को निहारती रही अयोध्या

संसद में राजनेता बहस के दौरान लिब्रहान आयोग की बाबरी विध्वंस पर आई रिपोर्ट के पन्ने पलटते रहे और यहाँ राम की नगरी अयोध्या में इस विध्वंस से मिले सूख चुके जख्म फिर हरे होकर रिसते रहे। अयोध्या के हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों से जुड़े आम लोगों ने विभिन्न टीवी चैनलों पर संसद में लिब्रहान रिपोर्ट पर चल रही बहस को टुकुर-टुकुर बेहद गौर से देखा। सिर्फ देखा ही नहीं  बल्कि रामनगरी में लिब्रहान रिपोर्ट पर संसद में हुई बहस पर एक अलग बहस चल पड़ी।

इसी बहस में शामिल होते हुए ‘हिन्दुस्तान’ ने राम नगरी के कुछ आम और खास लोगों से बातचीत की। इस दौरान कहीं आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई, तो कहीं सहमति के स्वर भी उभरे। अयोध्या के पूर्व नरेश बिमलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र के राजमहल के सामने रेस्टोरेंट चलाने वाले अचल गुप्त ने कहा कि संसद में आज हुई लिब्रहान रिपोर्ट पर बहस को उन्होंने टीवी पर पूरे समय देखा।

विभिन्न दलों के राजनेताओं ने अपनी बात रखी। फिर भी सबकी सुनने के बाद यह रिपोर्ट पूरी तरह से खरी नहीं है। उन्होंने कहा कि इस रिपोर्ट पर विरोध के स्वर अभिव्यक्त करने वाले राजनेताओं ने अपनी बात रखी और पक्ष में भी दूसरे दलों के राजनेताओं ने अपने तर्क दिए। इन सबके बीच उस घटना को 17 बरस बीत जाने का समय आड़े आ गया।

इतने बरस बीत गए, अब रिपोर्ट आने और उस पर बहस होने का कोई मतलब नहीं है। इसी तरह प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी के समीप स्थित बिड़ला धर्मशाला के प्रशासक पवन सिंह ने कहा कि संसद में लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर लड़ते हुए राजनेताओं को देखकर सिर्फ तरस आया। उन्होंने कहा कि इस रिपोर्ट के आ जाने के बाद क्या होगा, इस बारे में कुछ भी साफ नहीं।

नेता सिर्फ इस रिपोर्ट का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करने में लगे हैं। इस काम में एक नहीं सभी दल शामिल से दिखते हैं। रामलला के दर्शन मार्ग के समीप जूस कार्नर संचालित करने वाले रामबाबू गुप्त ने कहा कि बाबरी विध्वंस को लेकर आई लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर बहस टीवी पर देखकर बेहद दुख हुआ। वह इसलिए कि कोई इस रिपोर्ट को झूठा करार दे रहा था तो कोई इसकी सच्चई की कसमें खा रहा था।

उन्होंने कहा कि 17 वर्ष बीत जाने के बाद अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है। अयोध्या के आम वाशिंदे न तो मन्दिर चाहते हैं और न ही मस्जिद। उन्हें तो सिर्फ इससे सरोकार है कि फिर कभी ‘छह दिसम्बर 1992’ जैसे हालात न बनें।

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  • Web Title:पलटते रहे पन्ने, रिसता रहा जख्म