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27 सितम्बर, 2020|9:19|IST

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इच्छाशक्ति के दम पर महेंद्र ने सफलता का स्वाद चखा

माता-पिता का साया उठ चुका था। शादी हो चुकी हैं और दो बच्चों भी हैं। नौकरी मिली नहीं रही थी, उम्र बढ़ती जा रही थी। ऐसे में पीसीएस की तैयारी में जुटे रहना किसी चुनौती से कम नहीं थी। लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य के पीछे जुटे रहने की इच्छाशक्ति ने आखिरकार महेन्द्र कुमार सिंह को सफलता का स्वाद चखाया।

यह संभव नहीं होता यदि उनके छोटे भाई सुरेन्द्र कुमार सिंह की आत्मीयता नहीं मिलती। महेन्द्र के मनोयोग और सुरेन्द्र के सहयोग ने परिवार का सम्मान ही नहीं बढ़ाया, बल्कि सिविल सेवा और पीसीएस में चयन की उग्रसेनपुर की परम्परा को कायम रखा। 

पीसीएस 2006 में पाँचवें स्थान पर चुने गए फूलपुर के उग्रसेनपुर निवासी महेन्द्र कुमार सिंह ने अपने अंतिम प्रयास में बाजी जीत ली। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया था। जैसे-तैसे एमए तक की पढ़ाई पूरी की। उम्र के साथ विवाह भी हो गया। घर की स्थिति को सुदृढ़ करने और अपने गाँव की  परम्परा के अनुरूप पहले सिविल सेवा फिर पीसीएस में सफलता के लिए जुटे रहे।

इसी बीच छोटे भाई सुरेन्द्र की नौकरी उत्तर प्रदेश पुलिस में लग गई। सुरेन्द्र ने बड़े भाई की इच्छा और लगन का सम्मान करते हुए उन्हें आखिरी अवसर तक तैयारी में जुटे रहने के लिए प्रेरित किया। आर्थिक सहायता के हर मोड़ पर भाई के साथ खड़ा हुआ। उसका परिणाम आज सामने है। महेन्द्र का चयन उपजिलाधिकारी पद के लिए हुआ है।

अपनी सफलता से अभिभूत महेन्द्र ने कहा, पत्नी-बच्चों ने कभी आर्थिक तंगी का रोना नहीं रोया। हमेशा हौसला आफजाई की। छोटे भाई ने आर्थिक मोर्चा सम्भाल कर बड़ा सम्बल प्रदान किया। इनके सामूहिक उत्साह ने कभी उम्मीद को मरने नहीं दिया। 

फिर गाँव की परम्परा भी निश्चित सफलता के लिए उत्साहित करती रहीं। लक्ष्य के संधान के लिए योजनाबद्ध तरीके से तैयारी की और कई असफलताओं के बावजूद उम्मीद नहीं छोड़ी। विषय के तौर पर इतिहास और दर्शनशास्त्र का चयन भी फायदेमंद रहा।

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