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बंटी-बबली नहीं अब मनी-¨डपी कहिए!

दिमाग तो दिमाग होता है। अच्छे काम में लगाओ तो इतिहास बना देता है और बुरे काम में लगा तो गुनाह की इबारत गढ़ देता है। बिल्कुल मनीष और ¨डपी की तरह। इन पढ़े-लिखे नौजवानों ने चीटिंग और फ्रॉड का ऐसा तरीका खोजा निकाला कि देखकर पुलिस भी चक्कर खा गई। ‘फ्राड कंपनी’ के खेल में पूरा कमाल एक ऐसी कलम का होता था जो लिखता तो था मगर कुछ देर बाद सब कुछ मिट जाता था।


गुनाह और गुनहगारों की इस कहानी के सभी पात्र कानपुर के रहने वाले हैं। सबके सब ग्रेजुएट। तीन मैन, एक वूमन। नाम-मनीष उर्फ मनी, डिंपी, जितेन्द्र और दीपक। कुछ साल पहले नौकरी की तलाश में दिल्ली आए थे। कुछ राजधानी में छोटा-मोटा काम किया। जल्दी अमीर बनने के ख्वाब थे। काम और ठिकाना बदलते रहे। कभी एक जगह नहीं टिके। दिल्ली-एनसीआर की भीड़ में मुकाम नहीं मिलता देखा तो गुनाह के रास्ते पर चल पड़े।


थोड़ी साइंस पढ़ रखी थी। कैमीकल आदि के बारे में भी जानते थे। बार-बंटी-बबली फिल्म देखी तो उसी तरह पैसे कमाने का तरीका खोज निकाला। ऐसा पैन और स्याही तैयार कर दी, जिसने उनका काम आसान कर दिया। मनीष और उसकी कथित पत्नी डिंपी एचडीएफसी के फर्जी एक्जीक्यूटिव बनकर अपने जाल में फंसाने लगे। डिंपी फोन करती। मनीष बाकी के साथियों के साथ मिलकर आगे की राह तय करता। यहां तक कि क्रेडिट कार्ड बनाने के नाम पर भी चैक हासिल करने वाले इस ग्रुप के कारनामे सुनकर पुलिस भी हैरत में पड़ गई।


पुलिस हैरान इसलिए भी ज्यादा है कि नायाब तरीके से लोगों को ठगे जाने का यह सिलसिला पिछले चार साल से चल रहा था और किसी को कानों-कान खबर नहीं थी। हॉट सिटी के न जाने कितने लोग मनीष-डिंपी एंड ग्रुप के चक्कर में फंसकर अपने बैंक अकाउंट खाली करा चुके थे। एक अकेला आरोपी जितेन्द्र पुलिस के हत्थे चढ़ा तो रैकेट के बारे में सुनकर अफसर भी सकते में आ गए। इंस्पेक्टर इंदिरापुरम राजेश द्विवेदी का कहना है कि मास्टर माइंड मनीष, डिंपी और दीपक चौहान फरार हैं। वह पैन भी मिल गया है। कैमीकल युक्त स्याही दिल्ली से खरीदते थे। बाकी के तीनों पकड़े जाएं तो और भी राज सामने आ सकते हैं।

कहां-कहां की वारदातें
--पिछले चार वर्ष के दौरान इस ग्रुप ने दिल्ली की कई पॉश कालोनियों
--यूपी के गाजियाबाद,नोएडा,कानपुर व कई अन्य जिलों में भी वारदातें की

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