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उत्सर्जन तीव्रता पर दबाव में नहीं हैं: सरकार

उत्सर्जन तीव्रता पर दबाव में नहीं हैं: सरकार

उत्सर्जन तीव्रता में कमी का फैसला किसी दबाव में करने से इंकार करते हुए सरकार ने सोमवार को कहा कि जलवायु परिवर्तन के मामले में राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा तथा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के सिद्धांत पर भारत का रुख यथावत रहेगा।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर सरकार के जवाब से असंतुष्ट हो कर राज्यसभा में सोमवार को मुख्य विपक्षी दल भाजपा, वाम और सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे सपा के सदस्यों ने शून्यकाल के दौरान सदन से वाकआउट किया। पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने जलवायु परिवर्तन के बारे में कहा कि सरकार ने 2005 के स्तर से 2020 तक उत्सर्जन तीव्रता में 20 से 25 फीसदी की कटौती करने का जो निर्णय किया है वह किसी दबाव में नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि इस फैसले से कोपेनहेगन सम्मेलन में भारत को बातचीत करने में मदद मिलेगी।

उन्होंने यह कहा कि पीकिंग ईयर के मामले में किसी सीमा को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत सरकार का यह रुख है कि यदि उत्सर्जन कटौती के मामले में विकसित देश वित्तीय मदद और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को मंजूरी देते हैं तो उनकी कुछ बातों को माना जा सकता है।

इससे पूर्व, यह मुद्दा उठाते हुए सदन में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने आरोप लगाया कि सरकार ने जलवायु परिवर्तन के मामले में भारत के, पिछले 17 साल से चले आ रहे रुख को बदल दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने अपनी तरफ से उत्सर्जन तीव्रता में कमी का जो एकपक्षीय फैसला किया है उससे देश को क्या मिलेगा।

जेटली ने सरकार से जानना चाहा कि जब हमने कोपेनहेगन में सम्मेलन से पहले ही अपने पत्ते खोल दिए हैं तो बातचीत में हमें इससे फायदा होगा या नुकसान। उन्होंने जानना चाहा कि उत्सर्जन कटौती के लिए जो निवेश किया जाएगा उसका खर्च कौन वहन करेगा।

मार्क्सवादी सीताराम येचुरी ने कहा कि भारत सरकार को कोई भी बाध्यकारी फैसला स्वीकार नहीं करना चाहिए। उन्होंने पूछा कि क्या सरकार पीक ईयर के लिए कोई मानक स्वीकार करेगी। उन्होंने संदेह जताया कि सरकार ने उत्सर्जन तीव्रता में कमी का फैसला किसी दबाव में तो नहीं किया है।

येचुरी ने मांग की कि उत्सर्जन कमी के मामले में आधार वर्ष 2005 के बजाय 1990 होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्सजर्न तीव्रता में कमी के सरकार के फैसले का व्यय भारत की दो तिहाई जनता को वहन करना पड़ेगा। कम्युनिस्ट डी राजा ने कहा कि सरकार को वनों की कटाई रोकने के प्रस्ताव के बारे में अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए।

सदस्यों द्वारा उठाए गए मुद्दों का जवाब देते हुए रमेश ने कहा कि हमारे पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि हम अंतरराष्ट्रीय समीक्षा के मामले में केवल उन्हीं बातों को स्वीकार करेंगे जिन पर हमें वित्तीय मदद मिले या प्रौद्योगिकी हस्तांतरण किया जाए। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसे मामलों में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन प्रारूप समझौते के तहत ही कोई कदम उठाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की जवाबदेही केवल संसद के प्रति है।

रमेश ने कोपेनहेगन सम्मेलन से पहले भारत द्वारा उत्सर्जन तीव्रता में कटौती के फैसले को जायज ठहराते हुए कहा कि चीन, ब्राजील, इंडोनेशिया आदि देशों ने यह घोषणा पहले ही कर दी है। उन्होंने कहा कि इससे हमें सम्मेलन में बातचीत करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि सरकार जलवायु परिवर्तन के मामले में अपने प्रमुख रुख से बिल्कुल पीछे नहीं हटी है। सरकार का स्पष्ट रुख है कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन सीमा तथा पीक ईयर के मामले में कोई समझौता नहीं किया जाए।

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