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अधिकतर राष्ट्र चाहते हैं कि क्योटो प्रोटोकॉल जारी रहे

दुनिया के देशों के यहां जलवायु परिवर्तन से निपटने का तरीका ढूंढने के लिए इकट्ठा होने के बीच संयुक्त राष्ट्र के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा है कि अधिकतर राष्ट्रों की यह इच्छा है कि क्योटो प्रोटोकॉल संबंधी प्रतिबद्धताओं को दूसरे दौर के लिए विस्तार दिया जाए और स्वच्छ प्रौद्योगिकी के लिए आर्थिक मदद देने की तुरंत शुरुआत की जाए।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन प्रारूप संधि के कार्यकारी सचिव च्वो दि बोएर ने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन की शुरुआत से पहले संवाददाताओं से कहा कि मेरे विचार से इस बातचीत में शामिल अधिकतर देशों ने यह काफी साफ कर दिया है कि वे क्योटो प्रोटोकॉल को जारी रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि साथ ही, वे (अधिकतर राष्ट्र) संधि के तहत एक ऐसा दृष्टिकोण विकसित करना चाहते हैं जिसमें अमेरिका भी शामिल हो ताकि आर्थिक मदद की तुरंत शुरुआत हो सके और उसमें विकासशील देशों को जोड़ा जा सके।

क्योटो प्रोटोकॉल पर गठित अस्थायी कार्य समूह (एडब्ल्यूजी केपी) के अध्यक्ष जॉन एशे ने कहा कि सम्मेलन में क्योटो संधि पर समानांतर बातचीत की जा रही है और यह 15 दिसंबर तक पूरी हो जाएगी। इसके बाद एक रिपोर्ट पेश की जाएगी। एशे ने कहा कि प्राथमिक तौर पर हमारा ध्यान प्रतिबद्धता के दूसरे दौर पर केंद्रित है जो एक जनवरी 2013 से शुरू होगा। हम इस समय यह विचार कर रहे हैं कि हमें अधिक गैसों को इसमें शामिल करने की जरूरत है या नहीं।

क्योटो प्रोटोकॉल की प्रतिबद्धता के पहले दौर के तहत औद्योगिक राष्ट्र कार्बन उत्सजर्न में कटौती करने के लिए बाध्य हैं। इसकी अवधि 31 दिसंबर, 2012 को खत्म हो रही है और प्रतिबद्धता के दूसरे दौर के विस्तार के लिए बातचीत जारी है। अस्थाई कार्यसमूह जलवायु परिवर्तन के अन्य पहलूओं पर भी बातचीत कर रहा है जिसमें स्वच्छ विकास तंत्र, भू उपयोग संबंधी बदलाव और बास्केट ऑफ गैसेज का मुद्दा शामिल है।

उधर, बोएर ने रेखांकित किया कि क्योटो प्रोटोकॉल की अवधि समाप्त होने की अंतिम समय सीमा नहीं है। अत: अंतरराष्ट्रीय समुदाय को नई संधि और क्योटो प्रोटोकॉल में से किसी एक के बीच चुनाव करने की जरूरत नहीं होगी।

बोएर ने कहा कि मेरे विचार से क्योटो प्रोटोकॉल में एक संशोधन किया जाएगा। इसके तहत एक नई संधि होगी और मेरे विचार से हम कुछ व्यवहार्य निर्णयों तक पहुंचेंगे जिनका कार्यान्वयन इस सम्मेलन की समाप्ति के दिन से शुरू होगा। जलवायु परिवर्तन से निपटने संबंधी बातचीत दो तरीकों के तहत हो रही है। पहला तरीका बाली कार्य योजना है जिसके तहत संबंधित पक्षों को 2012 में क्योटो संधि से जुड़ी प्रतिबद्धता की अवधि समाप्त होने से पहले एक बाध्यकारी संधि पेश करने की जरूरत है।

दूसरा तरीका क्योटो प्रोटोकॉल में विस्तार देने का है। यही ऐसी एकमात्र संधि जिसके तहत औद्योगिक राष्ट्रों ने कार्बन उत्सजर्न में कटौती करने के बाध्यकारी प्रावधानों पर हस्ताक्षर किए थे। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने अपना यह रुख दोहराया है कि दूसरी अवधि में उपयुक्त प्रतिबद्धताएं होनी चाहिए और इसमें लक्ष्यों में कम से कम 40 फीसदी की कटौती प्रदर्शित होनी चाहिए।

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