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उर्दू मीडिया : कर्ज और खुशहाली के बाद

दो दिसंबर को जब दुबई की दो बड़ी कंपनियों दुबई वर्ल्ड और नखील के आर्थिक भवंर में फंसने की खबर आई तो पूरी दुनिया सन्न रह गई। उर्दू अखबारों की मानें तो दुबई के मेगा रियल स्टेट प्रोजेक्ट में दुनिया के तकरीबन सौ नामचीन हस्तियों का अरबों रुपया फंसा है।

उनमें हमारे भी कई फिल्मी कलाकार हैं। यह खबर भी कम चिंताजनक नहीं है। नौकरी के सिलसिले में गल्फ गए तकरीबन दस लाख भारतीयों के सामने फिर से रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। हर साल तकरीबन ढाई लाख हिन्दुस्तानी रोजगार के लिए अरब मुल्क जाते हैं। देश के विदेशी मुद्रा भंडार का करीब पच्चीस फीसदी यानी 1250 अरब खाड़ी देशों से आता है।

केवल केरल से हर साल हजारों भवन निर्माण मजदूर वर्क परमिट पर खाड़ी देश जाते हैं। वहां के अस्पतालों में दक्षिण भारतीय नर्सिग स्टाफ की खासी तादाद है। इन देशों में गार्मेंट और चमड़े के उत्पाद भी अपने देश से खासे निर्यात किए जाते हैं। भवन निर्माण सामग्री भी यहां से वहां जाती है। दुबई के रियल स्टेट कंपनियों के लिए काम करने वाले कई ठेकेदार भारत के हैं। दुबई की कुल आबादी का 42.3 फीसदी हिन्दुस्तानी बाशिंदों पर निर्भर है।
  
‘रोजनामा अलखलीज’ सऊदिया हुकूमत के हवाले से दावे कर रहा है। दुबई मेंआया मआशी बोहरान यानी आर्थिक संकट ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाएगा। सरकार इस पर जल्द काबू पा लेगी। यूएई के सेट्रल बैंक ने सरकारी कंपनी दुबई वर्ल्ड को आर्थिक संकट से उबारने की कोशिश शुरू कर दी है। ‘सियासत’ कहता है, आईएमएफ ने भी संयुक्त अरब अमीरात के इस फैसले का स्वागत किया है। वैसे, केरल के वित्तमंत्री टीएम थॉमस इससे इत्तेफाक नहीं रखते। इस सूबे के 20 लाख लोग खलीज में इमारती मजदूर हैं।

रोजगार छिनते ही उनके लौटने का सिलसिला शुरू हो गया है। ऐसे में केरल में बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी हो सकती है। ऐसा खतरा बिहार और उत्तर प्रदेश पर भी मंडराने लगा है। बकरीद के मौके पर घरवालों से मिलने दुबई से आए कामगारों को सऊदी सरकार से वापस न आने का संदेशा मिल गया है। उनसे कहा गया है कि हिसाब-किताब में उनके हिस्से जो रकम आएगी उन तक पहुंचा दी जाएगी। एक अखबार कहता है कि भवन निर्माण से जुड़े जूनियर इंजीनियर और मजूदर दुबई से वापस आने वाले एनसीआर के शहरों में नौकरी भी तलाशने लगे हैं। एक तो उन्हें नौकरी नहीं मिल रही। मिल भी रही है तो बेहद कम पगार पर।

अपने देश का रियल एस्टेट कारोबार पहले से सुस्त पड़ा है। रोजनामा ‘राष्ट्रीय सहारा’ कहता है। दुबई की घटना से लुधियाना को गहरा झटका लगा है। वहां के  लोग बड़ी संख्या में खाड़ी देशों में नौकरी करते हैं। दुबई संकट के चलते वहां विकसित किए जा रहे पचास प्रतिशत टाउनशिप का निर्माण अधर में लटक गया। दुबई के रेगिस्तान को दुनिया के सबसे चमचमाते बड़े कारोबारी और इंटरटेनमेंट हब में तब्दील करने वाले वहां के हुक्मरान शेख मोहम्मद बिन राशिदुलमुक्तूम की नीतियों की आज हर तरफ आलोचना हो रही है।

उन्होंने अपनी पुस्तक ‘माई विजन’ में दुबई की इंतहा तेजरफ्तार व गैरमामूली तरक्की के राज का खुलासा किया है। इसके जरिए उन्होंने दूसरे सऊदी देशों कतर, सऊदी अरब को भी विकास की अपार संभावनाएं तलाशने के लिए उनकी पॉलिसी अपनाने की सलाह दी थी।
   
‘सियासत’ कहता है- उनकी नीतियों पर अमल करने के लिए इन मुल्कों ने दुबई की तर्ज पर फेना नेशनल सेंटर, फ्री बिजनेस जोन, एडवांस इंस्फ्रास्ट्रक्चर जैसे प्रोजेक्ट पर विदेशी पूंजी निवेश की मदद से अमल में लाने का खाका भी तैयार कर लिया था। ‘मुंसिफ’ ने ‘कर्ज और खुशहाली’ में कहा है, ‘कर्ज लेकर घर चलाने की कोशिश खानदान में बहुत दिनों तक खुशहाली बरकरार नहीं रखती।’ ‘दुबई का माली बोहरान’, ‘दुबई का एक्तसादी बोहरान और हिन्दुस्तान’, ‘दुबई के बाद पंजाब के रियल एस्टेट पर कसादबाजी का साया’, ‘मुहतात अराब अमीरात की स्टॉक मार्केट में शदीद मंदी’ वगैरह शीर्षक से छपी खबरों में लगभग सभी उर्दू अखबार सहमत नजर आए।

दुबई वर्ल्ड के देशी-विदेशी बैंकों से तीन अरब 50 करोड़ डालर अदा करने के लिए छह महीने की मोहलत मांगने से दुनिया में फिर से आर्थिक मंदी का खतरा पैदा हो गया है, इससे तुरंत निपटने की संभावना कम नजर आती है। देश वैश्विक मंदी और महंगाई से पहले से जूझ रहा है। ‘औरंगाबाद टाइम्स’ कहता है- दुबई की खबर से दुनिया के स्टॉक एक्चेंज के कारोबार लुढ़कने लगे हैं। ‘सहाफत’ ने अपने संपादकीय में स्वर्गीय इंदिरा गांधी की दूरंदेशी की तारीफ की है।
 
लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं

malik_hashmi64@yahoo.com

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