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आंतरिक सुंदरता

सुंदरता की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं दी जा सकती। जितने लोग उतने सुंदरता के मापदंड, लेकिन आंतरिक सुंदरता और सभी से अलग और अद्भुत है। इसे वही परख सकता है, जो आंतरिक सुंदरता से परिपूर्ण हो। बाहरी सुंदरता के अनंत रूप और रंग हो सकते हैं और इन्हें बेहतर और कमतर मापा जा सकता है, लेकिन आंतरिक सुंदरता का यह मापदंड नहीं होता है। जहां बाहरी सुंदरता दूसरों को आकर्षित और निज में अहं भाव पैदा करती है।

वहीं आंतरिक सुंदरता मनुष्य को सही मायने में मनुष्य तो बनाती ही है, देव गुणों से ओत-प्रोत भी करती है। आन्तरिक सुन्दरता से व्यक्ति में विनम्रता, सदाशयता, करुणा, दया, क्षमा, सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् का भाव आता है। सृष्टि के हर प्राणी में वह परमात्मभाव के दर्शन करता है। जिस पवित्रत्मा का अनुभव वह खुद में करता है वही सृष्टि के हर प्राणी में करता है। वह बुद्धि या मन से संचालित नहीं होता, बल्कि सीधे परमात्मा से संचालित होता है। प्रज्ञा ऐसे ही व्यक्ति में होती है।

समस्या यह है कि हम कोई भी प्रश्न खुद से पूछते ही नहीं। दुनिया के तमाम सवाल जिनका ताल्लुक निज से नहीं होता है, हम हर क्षण पूछने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। यही वजह है जिन्दगी बीत जाती है, हममें वे जीवन-मूल्य नहीं अंकुरित हो पाते जिनसे आंतरिक सौंदर्य का स्फुटन नहीं हो पाता है। जो जीवन को पूर्णकामी बनाती हैं, उन चीजों की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता। यह विसंगति और विडंबना हमारी जिन्दगी का हिस्सा बनी रहती है। इस कमी को दूर करने के लिए ऋषि-महर्षियों ने तप, साधना और दिव्यता का मार्ग अपनाने पर जोर दिया जो वेद शास्त्रों में बड़े मार्मिक ढंग से वर्णित हैं। आंतरिक सौंदर्य के लिए वेद वाणी को धारण करना अत्यंत लाभकारी है। यह तभी हो पाएगा जब हमारा जीवन परमपिता की प्रेरणा से संचालित होगा। आप ऐसा करने को तैयार हैं कि नहीं, इसे खुद से पूछिए।

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