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मूल्यवृद्धि की पतंग

लखनऊ  नवाबों का शहर है। यहाँ अब भी मुर्ग लड़ाये जाते हैं। ताँगों की रेस होती है। हुक्के गुड़गुड़ाने के शौक का ऐसा असर है कि हुक्के-चिलम के दिन तो फाख्ता हो गये, फिर भी बुजुर्ग खर्राटे आज भी उसी अंदाज में भरते हैं। कोई सुने तो शक हो कि कोई भरी दोपहर या देर रात हुक्का गुड़गुड़ा रहा है। पतंगों का जमघट दीपावली के बाद अभी भी लगता है। रोजमर्रा की रफ्तार से जीवन में कितनी भी तेजी आई हो, पतंग उड़ाते और खाली बैठकर गप लड़ाते लोगों को देखकर, बड़ा सुकून मिलता है। शहर का तन बदला है।

मसलन, भीड़ के मुकाबले ज्यादातर चौड़ी सड़कें संकरी हो गई हैं। बगीचे उजड़ गये हैं। फिर भी, आधुनिकता और विकास की सारी बर्बादी के बावजूद, लखनऊ  का मन नहीं बदला है। लखनऊ  के मन, जुबान और तमीज-तहजीब की प्रामाणिक और आधिकारिक जानकारी तो क़े पी़ भाई के पास ही है। इस पर वही तजुर्बे की रोशनी डाल सकते हैं।

हम तो इतना जानते हैं कि जमघट में पतंगों और उनके उड़ाने वालों का यह प्रयास रहता है कि उनकी पतंग कैसे आसमान छुये। दूसरों की कोशिश होती है कि ऊँचे कनकौओं को कैसे, इस आसमानी अभियान से दूर रखा जाये। पेंच लड़ते हैं। अपने-अपने माँझे की धार का इम्तहान होता है। थोड़ी ही देर में, कुछ गगन छूती पतंगें पहले इधर-उधर आकाश में भटकती हैं और तत्पश्चात किसी बिजली के तार या झाड़ में जा अटकती हैं।

इधर बाजार में भी कीमतों का जमघट है। आटा, दाल, चावल, सब्जी, चीनी के मूल्यों की पतंगे आसमान छू रही हैं। सरकार भी अगर जमघट में हिस्सा लेती तो शायद उसे पता होता कि इस में पतंगे लगातार ऊँचे ही नहीं जाती हैं, उनके पेंच भी लड़ते हैं। वह नीचे भी आती हैं। देश की कीमतों का जमघट सरासर एक-पक्षीय होता जा रहा है। जैसे कीमतों की प्रतियोगिता, बस ऊपर जाने की और गरीब को ऊपर उठाने की हो!

सत्ता-दल और सरकार ही क्यों, विपक्षी पार्टियाँ भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। अजब आलम है। न कोई पेंच लड़ाकर इन्हें नीचे लाने की फिराक में है, न आम आदमी की आवाज ही उठा रहा है। इन आकाओं को फर्क ही क्या पड़ता है? सारे के सारे काले धन के कर्ण हैं। अंतर तो उसे है जो हाड़-तोड़ कर मेहनत-मजूरी से जीने भर को कमा रहा है। कभी सब्जी के सपने देखता था। उसकी एक ही हसरत है। बस रोटी उसे मिलती रहे। कहीं रोटी भी सपने के दायरे में गई तो क्या होगा?

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