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काले धन पर केवल चर्चा, कार्रवाई नहीं

भारत के ‘काले धन’ पर अक्सर चर्चा होती रहती है, किन्तु खेद है कि किसी भी राजनीतिक दल या सरकार ने निष्ठापूर्वक और सम्पूर्ण भाव से इस जटिल मुद्दे पर कुछ नहीं किया है। हमेशा यह मुद्दा विपक्ष में बैठे दल उठाते हैं और सत्तारूढ़ दल उस पर मौन रह जाते हैं, ऐसा क्यों? गत चुनावों के समय कई राजनीतिक दलों ने यह वायदा किया था कि विदेशों में जमा काला धन वापिस भारत लाया जाएगा और जमाकर्ता का पर्दाफाश किया जाएगा, किन्तु कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाया। इस मुद्दे पर जनता को गुमराह न करके उचित व कारगर कार्रवाई करें।
युधिष्ठिर लाल कक्कड़, लक्ष्मी गार्डन, गुड़गांव, हरियाणा

दिल्ली पुलिस की चुस्ती?
राजधानी दिल्ली की तथाकथित ‘होशियार व सदैव जनता की सेवा के लिए’ दिल्ली पुलिस उपराष्ट्रपति कार्यालय में कार्यरत एक कर्मचारी की साइकिल चोरी की रिपोर्ट कर्मचारी को तीन महीने तक टरकाने के बाद दर्ज करती है। अगर राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत किसी कर्मचारी अथवा आम नागरिक की साइकिल चोरी हो जाए तो, दिल्ली पुलिस उसे अपने स्वभाव, भ्रष्टाचार व लापरवाही के चलते कितने माह टरकाने और परेशान करने के बाद साइकिल चोरी की रिपोर्ट दर्ज करेगी? जो पुलिस परेशान को और परेशान करे, घात पर प्रतिघात करे, वह जनता की सेवा के लिए हरगिज नहीं हो सकती।
बी. एस. डोगरा, सीमापुरी, दिल्ली

यात्रियों के साथ धोखाधड़ी
दिल्ली से चलकर बस गजरौला के ढाबे पर रुकी, ड्राइवर व कंडक्टर को मुफ्त खाना खिलाया, यात्रियों से दोगुना दाम वसूल किए। यात्री चिल्लाए, परंतु ढाबेवाले की दादागिरी के सामने एक न चली। मजबूरी में दोगुना बिल भुगतान करना पड़ा। यह गोरखधंधा पुलिस की मिलीभगत से चलता है। सरकार दोषियों को दंडित कर उचित कदम उठाए।
मीना सतीश सोलंकी, बी 3/36, यमुना विहार, दिल्ली

अमेरिका की हालत पतली
अमेरिका में 109 बैंकों का दिवालिया घोषित हो कर बंद हो जाना यह दर्शाता है कि उसकी आर्थिक स्थिति खस्ताहाल हो चुकी है। इसका कारण उसकी फौज है, जो कि दुनिया के हर कोने में है। अमेरिका में सेना पर जितना खर्च किया जाता है, वह समूचे देश का दो-तिहाई हिस्सा होता है। बंद होते बैंक और सैन्य क्षेत्रों पर उसके बढ़ते खर्च अमेरिका की खस्ता हालत का बखान करते हैं।
निखिल मंडल, टेक वन स्कूल मास कम्युनिकेशन

मुआवजे की घोषणा मात्र
मुंबई में 26/11 हमले को एक साल हो गया, लेकिन मारे गए और घायल लोगों को मुआवजा नहीं मिला है। इसके लिए देश के राजनेताओं को ही दोषी ठहराया जा सकता है। देश में चलन हो चला है कि जब भी कोई आतंकवादी घटना, बम विस्फोट, या कोई ट्रेन हादसा आदि जिसमें कई लोगों की मृत्यु हुई हो या कई घायल हो गए हों आदि घटना के घटते ही सरकार मुआवजा देने की घोषणा कर देती है, परंतु कुछ समय पश्चात भूल जाती है।
नादिश खान, जामिया मिलिया, नई दिल्ली

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