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प्रयोगशाला में बना मांस बनाम कार्बन उत्सर्जन

लैबोरेटरी मांस! लाजिमी है ये बात सुनकर आप हैरान हो गए होंगे। आपके मन में न जाने कितने प्रश्नों का सैलाब उठा होगा। सबसे बड़ा सवाल आपके मन में यही उठा होगा कि आखिर ये कैसे संभव है कि मीट. और वो भी प्रयोगशाला में? कई लोगों के लिए विज्ञान की किसी कपोल कल्पना से कम नहीं होगा। दरअसल, हो ये हो रहा है कि हमारे-आपके दिमाग में बनने वाली कल्पना दुनिया की किसी न किसी प्रयोगशाला में आकार ले रही होती है। पिछले एक दशक में तो कम से कम विज्ञान के मामले में तो ऐसा सही साबित हुआ है। चाहें जेनेटिकली कोशिका से निर्माण की बात हो या बिना हृदय के 118 दिन जीवित रखने की बात या फिर डायनासोर और मैमथ बनाने की बात, विज्ञान ने नामुमकिन लगने वाली बातों को मुमकिन बना दिया है। लैबोरेटरी में मीट की परिकल्पना ऐसी ही है।

नीदरलैंड के शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में लैबोरेटरी मीट तैयार किया है। हालांकि इस कृत्रिम मांस को अभी चखा नहीं गया है पर वैज्ञानिकों को पूरी उम्मीद है कि अगले पांच सालों में ये बाजार में उपलब्ध होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि मांसपेशियों के ऊतकों में थोड़ा-सा बदलाव कर कृत्रिम मांस का निर्माण किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि कृत्रिम मांस का एक महत्वपूर्ण पहलू ये है कि यह पर्यावरण को भी किसी तरह की हानि नहीं पहुंचाता है। साथ ही इससे जानवरों की हत्या भी नहीं होगी। इसका सबसे प्रमुख पक्ष ये है कि एक जानवर के शरीर के मांस से कई टन मांस बना सकते हैं। वहीं इससे ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन भी कम होगा। इस प्रोजेक्ट को हॉलैंड सरकार और ससेज मैनुफैक्चर द्वारा फंड किया जा रहा है। अभी वैज्ञानिकों ने इसे पोर्क का अनुपयुक्त रूप बताया है। इससे पहले न्यूयॉर्क में गोल्ड फिश की मांसपेशियों के ऊतकों के द्वारा फिश फिलेट बनाया गया था।

कैसे बनेगा ये मांस
नीदरलैंड के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए प्रयोग के मुताबिक पहले जीवित सुअर की मांसपेशियों से मायोब्लास्ट कोशिकाओं को अलग किया जाता है। इसके बाद इन कोशिकाओं को प्रोग्रामिंग द्वारा ऊतक बनाया जाता है। फिर इसे जानवर के भ्रूण से बनाए गए न्यूट्राइंट आधारित सॉल्यूशन में या शोरबे में डाल दिया जाता है। इन कोशिकाओं की संख्या बढ़ाकर मांसपेशियों के ऊतक बनाए जाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा सफलतापूर्वक हो जाने के बाद मांस बनाया जा सकता है। प्रयोगशाला में काम कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि लैबोरेटरी में मांस बनाए जाने से ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन भी कम होगा।

कम नहीं फायदे
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक  2050 तक दुनिया भर में डेयरी उत्पादों की खपत दोगुनी हो जाएगी। इसका फर्क मौसम और पर्यावरण पर पड़ेगा। यही नहीं इससे मीथेन पर भी असर पड़ेगा क्योंकि यह जानवरों की पाचन क्रिया से निकलने वाला पदार्थ है। जिसका प्रभाव कार्बन डाईऑक्साइड की तुलना में 23 गुना ज्यादा होता है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया भर में 18 प्रतिशत ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के लिए मवेशी उत्तरदायी हैं।

साइंस फिक्शन में भी हुआ है जिक्र
साइंस फिक्शन लेखक फ्रेड्रिक पॉल ने पहली बार इन विट्रो मीट के बारे में लिखा था। अपनी किताब ‘द स्पेस मर्चेट’ में पॉल ने वेजीटेरियन मीट के बारे में लिखा था। अपनी किताब में उन्होंने भविष्य में इसे प्रोटीन के मुख्य स्नोत के रूप में उपयोग किए जाने की संभावना जताई थी।

ये भी हैं सवाल
कई वैज्ञानिकों का कहना है कि मांस की फांक को मांसपेशियों की कोशिकाओं का मैट्रिक्स या चक्रव्यूह नहीं समझना चाहिए। इन कोशिकाओं में विभिन्न तरह के वसा होते हैं, रक्त वाहिकाएं होती हैं, कोलेजन होते हैं  और कई तरह के टेक्सचर (जानवर की गतिविधि के अनुरूप) होते हैं। इसमें न्यूट्रिएंट की अधिकता बढ़ाकर अपशिष्ट पदार्थो को खत्म कर दिया जाएगा। अगर आप ऐसा मांस खाना चाहते हैं जिसमें खून का अवशेष या अंश हो तो वह कैसे संभव होगा, इसमें हड्डियों की उत्पत्ति के लिए क्या किया जाएगा? वहीं सबसे बड़ी चिंता संतृप्त फैट को लेकर व्यक्त की जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर ओमेगा 6 को ओमेगा 3 से बदल दिया जाएगा पर मुख्य बात ये है कि इससे मीट के स्वाद पर फर्क तो पड़ेगा?

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