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क्या मांस की खेती घटाएगी मानवता का अपराध बोध

न तो मांसाहारियों ने ठीक से नोट किया होगा, और न ही शायद शाकाहारियों ने, लेकिन पिछले हफ्ते की यह खबर भोजन की दुनिया की एक सबसे पुरानी नैतिक बहस का अंत कर सकती है। सोमवार को खबर आई थी कि नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में मांस उगाने में सफलता हासिल की है। ऐसा मांस जो विशालकाय परखनलियों में पनपेगा। इसमें सामान्य मांस की तरह प्रोटीन, विटामिन और खनिज तो होंगे लेकिन जो किसी धड़कते दिल या सक्रिय मस्तिष्क से नहीं जुड़ा होगा। इसमें मांस का स्वाद और रंग-रूप तो होगा, लेकिन उसकी तुलना किसी भी हरी सब्जी से की जा सकेगी। जिसमें किसी भी जानवर के मांस या रक्त की सिर्फ एक कोशिका लेकर अरबों-खरबों कोशिकाएं विकसित करने का कमाल होगा, और जो किसी भी प्राणी की हत्या किए बगैर
हासिल होगा।

जरा सोचिए मांसाहार बनाम शाकाहार की आदिकालीन बहस के मूल में हिंसा ही तो है। दुनिया के ज्यादातर शाकाहारी क्या सिर्फ इसलिए मांस से परहेज नहीं करते कि उसको हासिल करने के लिए किसी की जान लेनी होती है। किसी प्राणी को जानलेवा तकलीफ देनी पड़ती है। क्या पेटा के सारे प्रदर्शनों का मकसद उस तकलीफ और खूनखराबे को उजागर करना नहीं होता, जो मांस या फर हासिल करने के लिए जानवरों को भुगतना पड़ता है? अगर हां, तो सोचिए कि प्रयोगशाला में उगे हिंसा रहित मांस पर पेटा जैसे संगठनों को कितनी खुशी होगी। जानना रोचक है कि पेटा ने यह खबर आते ही साफ कर दिया है कि अगर इस मांस से पशु हत्या नहीं जुड़ी है तो उसे इस पर कोई आपत्ति नहीं है।

देखा जाए तो मांसाहारियों के लिए इससे बड़ी खुशखबरी कोई और नहीं हो सकती। यह खबर दुनिया के करोड़ों मांसाहारियों का अपराधबोध खत्म कर सकती है। करोड़ों शाकाहारियों को खुशी खुशी मांसाहारी बनाने पर राजी कर सकती है। मानव मनोविज्ञान के लिए साइंस की इस महान सेवा का नोटिस लेना जरूरी है। जैसे रिक्शा ने इंसान को जानवर बनाने वाले हाथरिक्शा वाले के जुल्म को विदा किया, जैसे मिक्सी ने कूटने-पीसने में गर्क होने वाली अतुलनीय मानव ऊर्जा को बचाया,  जैसे वाशिंग मशीन ने औरत को आजाद करने में एक महान भूमिका निभाई, उसी तरह प्रयोगशाला का मांस भी तो असंख्य जानवरों की तकलीफ और अरबों इंसानों की दुविधा को खत्म कर देगा।

अर्थशास्त्र समाज के कलेक्टिव वेलफेयर की बात करता है। इसी तरह किसी समाज में सामूहिक खुशी या सामूहिक तकलीफ भी होती है। पशु-पक्षियों और जलचरों की तकलीफ को भी इसमें जोड़ लें और साथ में मांसाहार को देख कर शाकाहारियों में उमड़ने वाली तकलीफ को भी उसमें जमा कर दें तो बायो मांस समाज के सामूहिक अपराधबोध ही नहीं, सामूहिक दर्द को भी कम देगा। वाकई भविष्य हमें बिल्कुल नई दुनिया में लाकर खड़ा करने जा रहा है। हमसे कुछ ही बरस दूर खड़ी इस दुनिया वे चीजें और मुद्दे होंगे जिनकी हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन जरा ठहरिए। चीजें इतनी आसान भी नहीं। मांस के स्वाद का तो विकल्प हो सकता है लेकिन हिंसा के स्वाद का नहीं। जिनके मुंह हत्या से हासिल मांस का खून लग चुका है, जिनको मांस नहीं, यातना देकर हासिल किया मांस ज्यादा अच्छा लगता है, जो मांस में भी झटका और हलाल का फर्क करते हैं, उन्हें यह खबर क्या आसानी से पच जाएगी?

जरा देखिए कि प्रयोगशाला के मांस पर एक विदेशी मांसाहारी ने गाजिर्यन अखबार में क्या प्रतिक्रिया दी है:
‘क्या परखनलियों में उगा मांस वैसा ही अप्राकृतिक और बेस्वाद तो नहीं होगा जैसा कि प्रयोगशाला वाले बीजों से उगे टमाटर का होता है? क्या उसमें देसी टमाटर या देसी चावल जैसी लज्जत होगी? क्या उसमें वास्तविक मांस जैसा रेशा होगा?  मुझे तो कसाई को काम करते देख वैसा ही आनंद मिलता है जैसा कि किसी बड़ी पेंटिंग को निहारते हुए मिलता है। क्या प्रयोगशाला की खेती से उगा मांस मुझे गोश्त का मजा दे पाएगा?

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