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सोमवार से शुरू होगा जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन

सोमवार से शुरू होगा जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन

कोपेनहेगन जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में राजनीतिक समझौते की उज्ज्वल संभावनाओं के बीच अमेरिका, भारत और चीन उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य पर 12 दिवसीय इस विशाल आयोजन में ग्लोबल वार्मिंग और क्योटो प्रोटोकाल की समाप्ति वर्ष 2012 के बाद इसके प्रभाव से निपटने के लिए सोमवार से नयी योजना तैयार करने को जुटेंगे।
      
इस शिखर वार्ता में अमेरिका और चीन सहित 100 देशों के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी शिखर सम्मेलन में शिरकत करने का निर्णय किया है। शिखर बैठक में किसी समझौते की संभावना उभर रही है लेकिन डेनमार्क के विवादास्पद प्रस्ताव को लेकर चिंताएं बरकरार है। इस डेनिश प्रस्ताव में सभी देशों के लिए उनके उत्सर्जनों पर रोक के लिए 2025 का प्रस्ताव तय किया गया है।
     
विश्लेषकों का मानना है कि मेजबान देश ने जो मसौदा प्रस्तुत किया है, वह विकसित और विकासशील देशों के बीच के भेद समाप्त करने वाला है और यह भारत तथा अन्य विकासशील देशों के यह घातक होगा। विकासशील देशों ने कहा है कि सच्चाई यह है कि औद्योगीकृत देशों ने बीते दशक में जो उत्सर्जन किये हैं वह ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है और उन्हें कार्बन कटौती के लिए व्यापक जिम्मेवारी लेनी चाहिए।
     
इसी सप्ताह भारत ने उत्सर्जन तीव्रता में स्वैच्छिक कटौती की घोषणा करते हुए अमेरिका और चीन के साथ सुर में सुर मिलाया था। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने 2025 तक भारत की उत्सर्जन तीव्रता में 20 से 25 फीसदी कटौती की घोषणा की थी।
     
चीन और भारत की स्वैच्छिक कटौती की घोषणाओं से उत्साहित अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने कार्यक्रम में बदलाव करते हुए अब इस बैठक में 18 दिसंबर को शामिल होने का निर्णय किया है। भारत ने कहा है कि देश के हितों को ध्यान रखते हुए वह जलवायु शिखर सम्मेलन के दौरान वह लचीला रूख अपनायेगा।

अमेरिका ने कार्बन उत्सर्जन में 17 फीसदी कटौती का प्रस्ताव रखा है जबकि चीन ने कार्बन उत्सर्जन तीव्रता में 40 से 45 फीसदी कटौती की घोषणा की है। कार्बन तीव्रता सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में उत्सर्जन की मात्रा है। तीव्रता को कम कर भारत और चीन कम कटौती सुनिश्चित करते हुए ऊंची सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बरकरार रखने को इच्छुक है।

चीन विश्व का सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक है जबकि भारत का इस क्रम में पांचवां स्थान है। पांच शीर्ष उत्सर्जकों की सूची में शामिल यही दोनों देश विकासशील हैं। क्योटो प्रोटोकाल के उत्तराधिकारी समझौते तक पहुंचने के भारी दबाव के बीच 18 दिसंबर को 100 से अधिक नेता अंतिम दिन शिखर सम्मेलन में जुटेंगे। हालांकि विकसित और विकासशील देशों के बीच अब भी गहरे मतभेद हैं।

वहीं भारत में राजनीतिक दलों और कार्यकर्ताओं ने सरकार को चेताया है कि वह कोपेनहेगन में किसी दबाव के आगे न झुके और ऐतिहासिक दायित्वों को ध्यान में रखते हुए भारत अपने रूख पर डटे रहे। क्योटो प्रोटोकाल को 1997 में स्वीकार किया गया था और उसमें विकसित देशों के लिए उत्सर्जन में कमी कानूनी रूप से बाध्यकारी है। इसमें 2012 तक पांच फीसदी की उत्सर्जन में कटौती कर इसे 1990 के स्तर से भी नीचे ले जाने का प्रावधान है।

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