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बादशाहों व खानों के बीच न भूलें प्रेमचंद को

'मैं हूं बॉलीवुड का सबसे बड़ा स्टार', ये हम नहीं कह रहे। ये तो बॉलीवुड का 'खान'दान गाहे-बगाहे मीडिया के हवाले से मुनादी करता रहता है। कभी शाहरुख खान 'आई एम द बेस्ट' की रट लगाते फिरते हैं तो कभी आमिर खान 'बॉलीवुड के ऐस यानी इक्के' की दुहाई देकर किंग खान के दावे को 'फना' करते नजर आते हैं। और कभी-कभी इनकी तू-तू, मैं-मैं में सल्लू मियां भी 'वांटेड' से मोस्ट वांटेड होने का दावा करते हैं। वहीं बॉलीवुड कुमार यानी अक्षय कुमार बीच में आकर बिग बी को सबसे बेहतर कहकर बीच-बचाव की कोशिश करते हैं। अजी दम तो ऋतिक, शाहिद, अजय देवगन जैसे बाकी कलाकारों में भी हैं, लेकिन नंबर-1 का दंभ भरना कहां कि समझदारी है। बॉक्स ऑफिस का क्या भरोसा, कभी किसी शुक्रवार पर शुक्र मनाया तो कभी किसी जुमे पर  मीडिया से मुंह छुपाया। आखिर हम क्यों 'आई एम द बेस्ट' के इस पचड़े में पड़ रहे हैं, दर्शक आप हैं और अब आप ही फैसला कीजिए कौन बेहतर है और कब तक। इस यक्ष प्रश्न के लिए आपको 'ऑल द बेस्ट'।

 

सिनेमा संस्कृति से अलग नहीं है। आखिर हमारी सांस्कृतिक पहचान और विशेषताओं को ही तो सिनेमा अपने में समेटता है। लेकिन संस्कृति हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई जैसे किसी खास धर्म की नहीं। संस्कृति एक भारतीय की। याद है हिंदू होने के बावजूद हम दोस्त लोग बचपन में देर रात तक उर्स के मेले में कव्वाली का मजा लेते थे (कभी-कभार वक्त मिलने पर अब भी जाते हैं)। जब थोड़ा बड़ा हुआ तो चर्च में मरियम की गोद में यीशू मसीह को देखा। गुरुद्वारे में तो शुरु से ही लंगर चखता आया हूं। यानी अगर मैं भारतीय हूं तो हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई और बाकी सभी धर्मों का संगम ही मेरी संस्कृति है। वाकई खुद को भारतीय कहा और माना जाए, तो दायरा कितना बढ़ जाता है। किसी शायर ने सच ही कहा कि 'ना मैं हिंदू, ना मुसलमान...मुझे जीने दो, दोस्ती है मेरा ईमान...मुझे जीने दो'। सभी को एक मानो और एक में सभी को मानो।

 

साहित्य की भी अपनी ही एक संस्कृति है। साहित्य हमारे सास्कृतिक मूल्यों को समेटे हुए होते हैं। या यूं कहें कि साहित्य हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की एक थाती है। याद कीजिए प्रेमचंद का काल, जब उन्होंने अपने साहित्यों से ग्रामीण भारत का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया कि आज भी लगता है कि बिल्कुल नजरों के सामने है। आज की युवा शहरी पीढ़ी के चंचल मन को शांत करने के लिए चेतन भगत हैं, जो हर युवा को भा रहे हैं। एक बार हिंदी के टीचर ने साहित्य की परिभाषा बताई थी। साहित्य मतलब जिसमें किसी का हित हो। मगर आज जरुरी नहीं है कि हित के लिए लिखी गई रचना ही साहित्य के दायरे में आती हो। स्वांत सुखाय के लिए लिखी गई रचना भी साहित्य का हिस्सा है। ये आप पर है कि आपका मन ओशो के 'संभोग से समाधि' में रमता है या फिर मस्तराम की फुहड़-काल्पनिक-रसीली कहानियों में।

 

बस हम तो बहुत कुछ कह चुके, बहुत कुछ सुना चुके... अब बताने और सुनाने की बारी आपकी है। हम जानना चाहते हैं कि कौन है आपका पसंदीदा  कलाकार, कौन सी फिल्म आप बार-बार देखना पसंद करते हैं, किस साहित्य में आपकी रुचि है और कौन सा मेला आपको अपने बचपन की यादें दिलाता है।

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