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यह आग तो पहले से ही सुलग रही थी

पंजाब में बिहार व उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ महाराष्ट्र जैसा खुला र्दुव्यवहार तो नहीं होता, लेकिन ‘? भैय्या’ जैसी टिप्पणियां तो आम हैं। कोई भी ताने देकर निकल जाता है। थप्पड़ या डंडा बरस जाना भी कोई खास बात नहीं। प्रवासी श्रमिक यहां रोटी कमाने आए हैं और परिवार का पेट पालना ही एकमात्र उद्देश्य है, इस बात को ध्यान में रखते हुए वह इस अपमान का घूंट पीते आ रहे हैं। दर्द सीने में दब कर रह जाता है, लेकिन बढ़ता जाता है। ऐसे में एकमात्र सहारा है कानून का, लेकिन जब यहां से भी मदद नहीं मिली तो दर्द असहनीय हुआ और लावा बनकर बह निकला लुधियाना की सड़कों पर।


पहले से ही सौतेलपन के एहसास में जी रहे इन मजदूरों को लगातार बढ़ रही लूट और छेड़खानी की घटनाओं ने आक्रोशित कर दिया। वीरवार रात को झपटमारी की घटना के बाद जो हंगामा पूरे लुधियाना में मचा वह इसी दबे हुए आक्रोश के अचानक फूटने का नतीजा था। इसी घटना ने आग में घी का काम किया है। स्थानीय गुंडों का श्रमिक आसान शिकार बन गए हैं क्योंकि पुलिस के पास भी इनकी कोई सुनवाई नहीं है। विरोध प्रदर्शन के बाद जो आग सड़कों पर दिखाई दे रही है उससे कहीं ज्यादा ये लोग अपने दिलों में दबाकर बैठे हैं। शुक्रवार की घटना महज एक छोटी घटना थी लेकिन यह एक बड़े विद्रोह का संकेत है। कफ्यरूग्रस्त इलाके के दौरे के दौरान जब कुछ पीड़ित श्रमिकों से बात हुई तो उनकी आवाज में दर्द, गुस्सा और बेगानापन साफ झलक रहा था। लोगों ने बताया कि शेरपुर के दो भाईयों को 4 अक्टूबर को लुटेरों ने अपना शिकार बनाया। तनख्वाह लेकर लौटते समय उन्हें लूटा गया। शिमलापुरी में चाट की दुकान लगाने वाले रमाशंकर को भी सितंबर में लुटेरों ने अपना शिकार बनाया था। लूट के साथ ही छेड़खानी की घटनाएं भी हुई हैं। तकलीफ तब और बढ़ जाती है जब पुलिस इन शिकायतों को अनसुना कर बिहारी श्रमिकों को उल्टे पांव लौटाती है। ढंडारी चौकी जहां से शुक्रवार को बवाल शुरू हुआ वहां पिछले तीन माह में श्रमिकों की शिकायत पर एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया है जबकि एक दजर्न से ज्यादा लूट की वारदातों को तो अक्टूबर माह में ही अंजाम दिया गया है। आलम यह है कि तनख्वाह लेकर सही सलामत घर लौटने में श्रमिक डरे रहते हैं।


‘महिना ले के घर पहुंचे में करेजा धुकधुकाइल रहेला। हई वर्दी पहिन के जवन बईठल बाड़न स इन्हींनी के त मजदूरन के फूटल आंखियों से ना देखेलन स। खीस ना बरी त का होई?’ शेरपुर में घुसते ही प्रवासी मजदूरों की कालोनी के पहले ही घर के सामने बैठे 59 साल के बुजुर्ग ने अपनी बातों से कहानी का मजमून बता दिया। पिछले माह इन्हीं के दोनों बेटों को स्थानीय गुंडों ने शिकार बनाया था।


इसी इलाके में थोड़ा आगे बढ़ने पर सिर पर पट्टी बांधे सासाराम के राम निवास बैठे थे। शुक्रवार के हंगामें में पुलिसकर्मी के धक्के में उन्हें चोट लगी थी। इनके दोनों बच्चों की आंखों में वो खौफ अब तक झलक रहा था जब इनकी मां को रास्ते में रोक कर कथित रूप से पुलिस के सामने कुछ लोगों ने छेड़खानी की कोशिश की थी। लूट की वारदात की तरह इसे भी पुलिस वालों ने हवा में उड़ा दिया।


रोजी तलाश में घर से हजारों मील की यात्रा कर आए इन श्रमिकों को इस बेगाने शहर में किसी का सहारा नहीं दिखाई दे रहा है। राजनीतिज्ञ इनसे अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, पुलिस के लिए यह हीन है, गुंडों के लिए यह आसान शिकार हैं और प्रशासन के साथा स्थानीय लोगों से इन्हें कोई भी मदद नहीं है। अपने दु:खों को बांटने के लिए इनके पास अपने ही लोगों के कमजोर कंधे हैं जो पहले से ही कई तरह के बोझाें से दुहरे हुए हैं। इनका दर्द सुनने वाला कोई नहीं है। शुक्रवार को जब ढंडारी कला में छीना-झपटी की घटना हुई और पुलिस ने भुक्तभोगियों को चौकी से भगा दिया तो गुस्सा फूट पड़ा। हर भुक्तभोगी अपने पिछले सारे दु:खों और तकलीफों का हिसाब किताब करने उमड़ पड़ा। शहर के हालात दिन पर दिन बिगड़ रहे हैं। शनिवार को आशुतोष महाराज के विरोध के बाद जो स्थिति उभरी उसका आगामी शिकार भी यह प्रवासी खुद को ही मान रहे हैं। उनका कहना है कि इस मुद्दे को लेकर भी उन्हें ही निशाना बनाया जाएगा।

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