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भुलाए नहीं भूलते काली आंधी के वे दिन

कुछ दृश्य दिल और दिमाग में ऐसे जज्ब हो जाते हैं कि उन्हें याद करने के लिए एक पल भी नहीं गंवाना पड़ता। छ: दिसम्बर 1992 की वह सुबह आज तक जेहन में ऐसी जकड़ी रखी है, जैसे रेफ्रिजरेटर में रखा कोई पदार्थ। ऊपर से ताजा, भीतर से बासी।
आगरा में दिसंबर की मरियल धूप में मैं बुखार से जूझ रहा था। थर्मामीटर का पारा 105 से 106 के बीच में झूल रहा था। तभी फोन की घंटी बजी। अत्यंत उत्तेजित स्वर में एक सहयोगी ने बताया कि अयोध्या में बाबरी ढांचे पर लोग चढ़ दौड़े हैं। कोई आश्चर्य नहीं हुआ। पिछले दो साल से जिस तरह विश्व हिंदू परिषद और उसके सहयोगी संगठन धर्म के इस तंदूर को हवा दे रहे थे, उससे तय था कि लपटें एक न एक दिन बेकाबू हो जाएंगी। लखनऊ में उस समय भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और कारसेवकों के आदर्श कल्याण सिंह मुख्यमंत्री। नई दिल्ली में नरसिंह राव हुकूमत कर रहे थे। वार्धक्य से वीतराग उपजता है। किस्मत ने उन्हें सत्ता का सुख दे दिया था। वे अपनी अल्पमत सरकार को जोड़-तोड़ से बहुमत में तब्दील करने में जुटे थे। देश सांप्रदायिक उन्माद की आग में तपता जा रहा था।

माहौल कुछ ऐसा बन गया था कि बहुसंख्यकों के एक बड़े वर्ग को लगने लगा था कि यह उनके पुनरुत्थान का दौर है। इतिहास से सबक न लेकर हर हमलावर से हारते आए लोगों के वंशज यह सोचने लगे थे कि अतीत की पराजयों का प्रतिशोध लेने का सही वक्त आ गया है। भीड़ की भुनभुनाहटें आकाश गुंजाने लगी थीं। कोलाहल ने सह-अस्तित्व की परंपराओं को कोहरे के मानिंद ढंक लिया था। अजीब-ओ-गरीब कौतुक किए जा रहे थे। कभी महिलाओं से निषेधाज्ञा तोड़कर सड़कों पर सामूहिक आरती करने की अपील की जाती थी। पुलिस रोकती तो उस पर ‘मुल्ला मुलायम’ का सिपाही होने का आरोप लगता। इसके विरोध में छतों पर आरती की अपील की जाती थी और मिश्रित आबादी वाले मोहल्ले तनाव से जड़ होने लग जाते थे। जिन शहरों में आजादी के बाद कभी दंगा नहीं हुआ था, वे भी सांप्रदायिक संवेदनाओं से उबलने लग पड़े थे। एक तरफ संघ परिवार था, जो इस आंच में घी डाल रहा था। दूसरी तरफ उनके सियासी विरोधी थे, जो ‘परिंदा भी पर न मार सकेगा’ जैसे बयान देकर इस आग को हवा दे रहे थे। आम आदमी न चाहते हुए भी उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनता जा रहा था। लोगों ने महाभारत को पढ़ा या टीवी पर देखा था। उसे बूझने का मौका पहली बार मिल रहा था। घर के बीच दीवार कैसे उठती है, उसका दर्द और उसे सहने की मजबूरी क्या होती है? यह भी समझ में आ रहा था।
 
इसीलिए उस फोन ने न कोई आश्चर्य दिया और न सदमा। लगा कर्तव्य बुला रहा है। बुखार उतारने के लिए ठंडे पानी से नहाया और सीधे अखबार के दफ्तर की ओर दौड़ा। उस समय निजी चैनलों के ‘लाइव’ बुलेटिन नहीं थे। रेडियो सरकारी था और एजेंसियां जैसे खुद ही पथरा गईं थीं। अयोध्या में मौजूद संवाददाता भी इस सारे दृश्य से हकबका गए थे। तब मोबाइल फोन होते नहीं थे। लिहाजा खबरों से ज्यादा अफवाहें हवा में तैर रही थीं। समूचा देश सहम गया था। लगा कि जिस लावे को हम हर ओर खदबदाता देख रहे थे, वह बह निकला है। तभी एक ऐसी घटना घटी, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मैं जिस अखबार के दफ्तर में काम करता था, वो शहर के बीचोंबीच था। पहले कुछ लोग आए फिर उनकी तादाद बढ़ती गई। दजर्नों में, सैकड़ों में और फिर हजारों में। पुलिस का कहीं पता नहीं था। कप्तान सहित सारे लोग संवेदनशील इलाकों में गश्त कर रहे थे। दफ्तर के बाहर जमा लोगों में उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। वे चाहते थे कि हम आनन-फानन में विशेषबुलेटिन छापकर उनको दे दें। हमारे पास न फोटो थे और न प्रामाणिक खबरें। फिर बुलेटिन को छपने के लिए अपने वक्त की दरकार थीं। करें तो क्या करें? बाहर उफनती उत्तेजना कभी भी हिंसक रूप ले सकती थी। एक साथी ने सुझाव दिया कि क्यों न आप बाहर निकलकर एक भाषण दे दें, शायद इससे लोग लौट जाएं। मैं बाहर निकला। ये क्या? दफ्तर के बाहर गली तक सिर्फ सिर ही सिर नजर आ रहे थे। भीड़ में से रास्ता बनाकर थोड़ा आगे निकलना चाहा ताकि सबको एक साथ संबोधित कर सकूं। असंभव। लोग टस से मस होने को तैयार नहीं थे।

तभी किसी ने मुझे अपने कंधों पर उठा लिया। अनूठा अनुभव था वह। एक कंधे से दूसरे, दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे कंधे पर डोलता हुआ मैं दिमागी तौर पर भी डोल रहा था। जय श्रीराम, जय श्रीराम के नारों से वे लोग आसमान फाड़े डाल रहे थे। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? उन्हीं कुछ क्षणों में दिमाग में आया कि फ्रांस की राज्यक्रांति ऐसे ही हुई होगी। अचानक और अनायास। वहां लोग सैकड़ों साल की गुलामी से खफा थे। यहां लोगों पर अतीत के बोझ से मुक्ति का खोखला दावा ठोक दिया गया था। डर लग रहा था। अगरअचानक ये लोग हाथ खींच लें, तो मैं कहीं पैरों तले न कुचला जाऊं? सामने एक होस्टल की चारदीवारी थी। मैंने उस ओर इशारा किया, लोगों ने मुझे वहां खड़ा कर दिया। हांफते-कांपते मैंने न जाने क्या कहा, पर सभी लोग शांत हो गए और इस आश्वासन के साथ लौट गए कि हम उन्हें बहुत जल्दी बुलेटिन छापकर देंगे। आज 17 साल बाद सोचता हूं कि ये वे लोग थे, जो धर्म के नाम पर छले गए। उन लोगों के बारे में भी सोचता हूं, जो एक काल्पनिक गुलामी से मुक्ति के लिए प्रेतयुद्ध की भेंट चढ़ गए। हालांकि, इस महान देश ने उन उथल-पुथल भरे अंधियारे दिनों को भी अपनी आत्मा में सोख लिया। पर यह सच है कि पूरी दुनिया के सामने भारतीय राष्ट्र-राज्य की ऐसी किरकिरी पहले कभी नहीं हुई थी। ऑपरेशन ब्लू स्टार के एक दशक के अंदर यह दूसरी घटना थी, जिसने दुनिया के सामने हिन्दुस्तान की गंगा-यमुनी तहजीब को बेपरदा किया था। यह भी एक तल्ख सच है कि छ: दिसंबर 1992 की ध्वंसलीला ने हमारे कुछ लोगों के मन में अलगाव के ऐसे बीज बोदिए कि आज वे देश के दुश्मनों तक से हाथ मिलाने से नहीं चूकते।

श्रीमान लिब्रहान किसी को दोषी साबित करें या न करें, सरकारें दंड विधान का प्रयोग करें या न करें, पर यह तय है कि जानबूझकर किया गया यह एक ऐसा पाप था, जिसका दंड हमें लंबे समय तक भोगना पड़ेगा। उम्मीद है। 21वीं शताब्दी का भारत पिछली सदी में उपजे इस हादसे को जल्दी से जल्दी अपनी ऊर्जा की आंच में तपा कर खाक कर देगा। 

shashi.shekhar@hindustantimes.com

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