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योद्धा बने हर दलित

भारतीय भाषाओं में इधर दलित लेखकों की कई मर्मस्पर्शी आत्मकथाएं प्रकाशित हुई हैं। उसी की नई कड़ी ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ है। इसके लेखक हैं श्यौराज सिंह बेचैन। इस किताब में भी दलित दुख-दर्द की करुणाभरी दास्तान है। यदि आप इस देश में दलितों का प्रामाणिक आईना देखना चाहते हैं तो इन किताबों से गुजरना ही होगा।

यह वही महान भारत है, जहां सदियों से दलितों को अछूत माना जाता रहा है और उन्हें मनुष्य की मर्यादा तक नहीं दी जाती रही है। आज दलित चेतना के इतने शोर के बावजूद अभी भी देश में सवर्ण मानसिकता हावी है। आंध्र के होटलों में आज भी तीन तरह के गिलास रखे होते हैं। ऊंची, कम उंची और निचली मानी जानी वाली जातियों के ग्राहकों के लिए क्रमश: स्टील, कांच और प्लास्टिक के गिलास दिए जाते हैं। जिन प्रदेशों में प्रगतिशील सरकारें हैं, वहां भी जातिभेद और अस्पृश्यता एक कड़वा यथार्थ है। बंगाल में दलितों के हाथ बनाए मिड-डे-फूड के सर्वणों द्वारा नहीं खाने जाने की खबरें अक्सर आती हैं।

बंगाल के इसी वाम राज में मेदिनीपुर में निचली जाति की चुनी कोटाल को उच्च शिक्षा से वंचित रखने की कितनी कोशिशें नहीं हुईं? सवर्ण शिक्षक चुनी को लगातार हतोत्साहित करते रहे, प्रताड़ित करते रहे, अंतत: उसे एमएससी नहीं करने दिया गया और आत्महत्या करने को बाध्य किया गया। चुनी को आत्महत्या के लिए मजबूर करनेवाले सवर्ण शिक्षकों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई, क्योंकि माकपा की सरकार में भी सवर्ण मानसिकता सदैव हावी रही है। इसी सवर्ण मानसिकता को श्यौराज सिंह बेचैन ने शिद्दत से महसूस किया है। उनकी आत्मकथा में इस मानसिकता के कई मर्मस्पर्शी आख्यान हैं। कई-कई दूसरी अंतर्कथाएं भी समानांतर चलती रहती हैं।

मास्साब की बारात में बर्फीली ठंड में लेखक को रात को बाहर रहना पड़ा। लेखक का ही प्रश्न है-  कौन अपनी रजाई में सुलाता मुझे? कौन बिस्तर देता एक अछूत को? इस देश के दूसरे दलित बच्चों की तरह श्यौराज का बचपन भी अभावों और तिरस्कारों के बीच बीता। छह वर्ष की उम्र में ही पिता की मौत हो गई। पूरे परिवार पर अभावों का पहाड़ भी टूट पड़ा। बेचैन ने लिखा है- पेट भरने के लिए क्या-क्या नहीं किया मैंने। बेचैन ने मोची का काम किया। जूतों पर पालिश की। अपने परिवार को अभाव और भूख की जिंदगी बसर करते देखते रहे। आठ साल की उम्र में दिल्ली आए।

नींबू और अखबार बेचकर पढ़ाई के पैसों का प्रबंध किया। अखबार की कुछ महिला ग्राहकों ने उनका दाखिला स्कूल में करा दिया। दिन के बारह बजे तक उनके नींबू नहीं बिक पाते थे, इसीलिए स्कूल देर से पहुंच पाते थे। पढ़ाई का प्रबंध करने के लिए ही उन्होंने मास्साब के यहां बंधुआ बनकर काम किया। वहां भी उन्हें शोषण और धिक्कार से मुक्ति नहीं मिली। बेचैन ने कठिन संघर्ष कर पढ़ाई पूरी की। वे अपनी सीढ़ी खुद बने और उस पर ऊपर चढ़े। एमए के बाद पीएचडी और डी लिट् किया। बेचैन बचपन में अंधविश्वासी थे। किशोरावस्था में आर्य समाजी और युवा अवस्था में वामपंथी बने और अब आम्बेडकर की राह के पथिक हैं। पेशवाशाही के कारण आम्बेडकर को भी पग-पग पर अपमान झेलना पड़ा था। आम्बेडकर ने जातिविहीन समाज के लिए संघर्षरत लोगों को जोड़ने का काम किया, इसीलिए वे अमर हैं।

आम्बेडकर के चिंतन का गहरा असर बेचैन के सृजन व संघर्ष में लक्ष्य किया जा सकता है। बेचैन ने आत्मकथा के अलावा दलित चिंता और चिंतन पर कई किताबें लिखी हैं। गद्य और पद्य दोनों में। इस तरह की किताबों की सार्थकता इस बात में है कि दलितों में चेतना जगाने, जातिभेद की मुक्ति के संघर्ष के लिए हर दलित को योद्धा बनाने के लिए वे कितना योगदान कर पाती हैं, क्योंकि मुक्ति के लिए अंतत: हर दलित को योद्धा बनना ही होगा और सवर्ण मानसिकता के अत्याचार के प्रतिरोध में खड़ा होना ही होगा।

यह देखकर आश्वस्ति होती है कि हाथ में कलम पकड़ने वाले बेचैन भी सीधे जमीन पर उतर कर प्रतिरोध कर्म के लिए खड़े होते हैं। अस्पृश्यता, अंधविश्वास के खिलाफ गांव-बस्ती में मुहिम चलाने का जोखिम उठाते हैं और पाखडों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करते हैं। मेरी राय में हर दलित के लिए यही काम्य है।

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