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एक फक्कड़ पत्रकार का जाना

शारदा पाठक चलते-फिरते विकीपीडिया थे। इतिहास की कोई तारीख हो, किसी फिल्म के निर्माण का वर्ष हो, संगीतकार और निर्देशक का नाम जानना हो या फिर दर्शन और विज्ञान के किसी गूढ़ विषय पर चर्चा करनी हो, फट से शारदा पाठक से संपर्क किया जाता था। फटाफट कुछ लिखवाना हो तो पाठक जी तुरंत लेखक बन जाते थे। लेकिन बात-बात में किसी की पगड़ी उछाल देना उनकी आदत थी। प्रभाष जोशी को ‘मलाई लामा’, उपाध्याय को ‘डिप्टी चैप्टर’ जैसे जुमले बोल कर मजा लेते रहते थे।

उनके इसी रूप से ‘जनसत्ता’ अखबार में मुलाकात हुई थी जो ‘हिन्दुस्तान’ अखबार तक जारी रही। दोनों उनके सहज ठिकाने थे, जब दिल्ली में होते वहां जरूर जाते थे। लेकिन उनकी चर्चा में थोड़े समय बाद अपना शहर ‘जबलैपुर’ भी आ जाता था। इसीलिए उन्होंने 74 साल की उम्र में अंतिम सांस वहीं ली। उनका जाना एक फक्कड़ पत्रकार का चले जाना है। शरीर और सांसारिकता से अलग वे बहुत पहले ही हो गए थे, लेकिन उसकी विधिवत घोषणा नवंबर के तीसरे हफ्ते में हुई। मैले -कुचैले, होली-दीवाली पर भी न नहाने वाले शारदा जी मन से निर्मल, वाणी से कभी मजाकिया, तो कभी तल्ख, लेकिन ज्ञान से लबरेज थे। साधारण सी शर्ट-पैंट, हवाई चप्पल और कंधे पर भूदानी झोला, जिसमें लिखने के लिए कुछ कागज, एक पैड, खाने के लिए दो पराठे और दो बीड़ा पान पड़ा रहता था। यही उनकी गृहस्थी थी। हिंदी और अंग्रेजी पर व्याकरण सम्मत पकड़ रखने वाले शारदा जी असाधारण पाठक थे। उनकी अंतर्दृष्टि विलक्षण थी, शायद इसी नाते चौहत्तर की आयु में भी उन्हें कोई चश्मा नहीं लगा। जीवन में जब भी, जो भी, पढ़ा वह आखिर तक याद रहा। इसीलिए वे जिनके भी संपर्क में आए, उन्हें भी वे हमेशा याद रहेंगे। बिना किसी संदर्भ के राजनीति,
अर्थशास्त्र, इतिहास, खेल, फिल्म, धर्म, साहित्य किसी भी विषय पर लिख सकते थे और किसी भी विषय पर बात कर सकते थे। जबलपुर विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास और अर्थशास्त्र में एमए करने वाले पाठक जी पहले विषय के गोल्ड मेडलिस्ट भी थे। वे आचार्य रजनीश यानी ओशो से दो साल जूनियर थे और उनकी लीलाओं का आंखों-देखा वर्णन सुनाते थे।

विद्रोही स्वभाव के कारण उनकी अपने गाइड डॉ राजबली पांडे से नहीं पटी और पीएचडी छूट गई। वे उनकी पुरातनपंथी स्थापनाओं से सहमत नहीं थे। लेकिन जीवन से विरक्त वे तब हुए, जब उनके पिता ने एक खास जगह विवाह करने का हिंसक दबाव बनाया। उसके बाद उन्होंने अपना सब कुछ समय की धारा में छोड़ दिया। उनका मोह सिर्फ मां के लिए बचा। कैरियर, पैसा, नौकरी और प्रतिष्ठा समेत समस्त इच्छाओं को तिलांजलि दे दी। यही विद्रोह उन्हें पत्रकारिता की तरफ ले आया, जिसे उन्होंने दूसरों के विपरीत ‘दिया बहुत ज्यादा और लिया बहुत कम’। निजी जीवन के प्रति नफरत की हद तक बीतरागी होने के बावजूद उन्हें दुनिया की हर चीज को जानने और उसकी चर्चा करने में भरपूर रस आता था। जबलपुर के ‘नवभारत’ में कई सालों तक काम करके जब मन भर गया तो 1972 में दिल्ली आ गए। यहां ‘हिन्दुस्तान’ अखबार उनका पहला ठिकाना बना। शीला झुनझुनवाला के संपादकत्व में उन्होंने ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के कई अंकों के लिए श्रेष्ठ योगदान दिया। बताते हैं कि इमरजंसी में जब दिल्ली में ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह हुआ तो उसकी दैनिक ‘फेस्टिवल’ पत्रिका को उन्होंने कमाल का निकाला। उस समारोह में फेदरिको फेलिनी, अकीरो कुरोसोवा और सत्यजित राय जैसे फिल्मकार हिस्सा ले रहे थे। ज्ञान-विज्ञान और मनोरंजन को समझने, संभालने और उसे अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता के धनी शारदा जी वास्तव में करपात्री थे। बड़े से बड़े काम का न ज्यादा मांगा न किसी ने दिया।
किसी अंग्रेजी अखबार का विज्ञापन परिशिष्ट निकाल दिया तो किसी की पीएचडी लिखवा दी। कभी दो जून भोजन पर तो कभी प्रेम के दो बोल में। दस साल पहले मुझसे कोलकाता की नेशनल लाइब्रेरी से योगिनी तंत्र पर बागची की दुर्लभ किताब की प्रतिलिपि मंगवाई। कहते थे किताब लिखनी है। महाराष्ट्र के किसी विश्वविद्यालय की प्रोफेसर के साथ लंबी कितावत चल रही है। जीवन के बाकी दिन उन्हीं के साथ बिताने हैं। बाद में उनका जिक्र बंद कर दिया। पिछले साल होली पर जब कुछ पत्रकार मित्रों ने घेर कर उनसे शादी के बारे में पूछा तो अपनी एक हास्य कविता सुना बैठे-‘लोग कहें हम काठ के उल्लू, हम कहते हम सोने के। इस दुनिया में बड़े फायदे होते उल्लू होने के’। जब दुनिया में उल्लू बनने-बनाने की होड़ मची हो तो पाठक जी भी हम सब को उल्लू बना कर चले गए। उनसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।

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