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चुनौती थी कि अमिताभ अमिताभ न लगें

विज्ञापन की दुनिया से फिल्मी दुनिया में आने वाले कई लोग रहे हैं। आर. बालकृष्णन उर्फ बाल्की ‘पा’ की वजह से खबरों में हैं। वे ‘पा’ के डॉयरेक्टर हैं। 34 साल की युवती और 64 साल के अधेड़ के बीच की परंपरागत प्रेम कहानी ‘चीनी कम’ बतौर डॉयरेक्टर उनकी पहली फिल्म थी। ‘पा’ की शूटिंग लंदन से लेकर दिल्ली के मेट्रो स्टेशन तक हुई है। बीते शुक्रवार को रिलीज हुई इस फिल्म को दर्शकों से लेकर फिल्म समीक्षकों की तारीफ मिल रही है। बाल्की से एक संक्षिप्त बातचीत की अमिताभ पाराशर ने :

‘चीनी कम’ जैसी हल्के-फुल्के विषय वाली फिल्म के बाद ‘पा’ जैसे गंभीर विषय वाली फिल्म के बारे में कैसे सोचा ?
‘ चीनी कम ’ के बाद मैं अमित जी को ही ध्यान में रखकर एक फिल्म की पटकथा लिख रहा था। जब यह तैयार हुई तो उनसे मिलने गया। उन्होंने इसे सरसरी तौर से देखा और चुप हो गए। मैं उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा था। जब वे कुछ नहीं बोले तो मैंने उनसे पूछा कि क्या यह आपको बुरी लगी? उन्होंने कहा, ‘नहीं, लेकिन क्या यह कुछ ज्यादा ही हल्की-फुल्की नहीं है?’ मैंने उनसे कहा कि मैं तो इसी तरह की फिल्म बनाना चाहता हूं। वे संतुष्ट नहीं हुए। वे जानना चाहते थे कि क्या यह पटकथा इस फिल्म को उनकी कुछ बेहतरीन फिल्मों के आसपास ले जाएगी? वे विषय में थोड़ी अतिरिक्त गंभीरता चाहते थे। वे पटकथा में इमोशनल तत्वों को प्रमुखता देना चाहते थे। मैंने जो शुरुआती कल्पना की थी, उस हिसाब से ‘पा’ को एक हल्की-फुल्की कॉमेडी बननी थी। उनकी गंभीरता और उनकी समझ देखकर मैंने पटकथा पर फिर से काम शुरू किया। जब दुबारा उनके पास बदलाव के साथ गया तो वे बहुत खुश हुए।
अभिषेक का पुत्र बनने के आपके प्रस्ताव को उन्होंने कैसे लिया?
वे अचंभित थे। उनका कहना था कि इतनी चुनौतीपूर्ण भूमिका उन्होंने पहले कभी नहीं की। वे विषय सुनकर कुछ देर चुप होकर सोचने लगे। इस बात को लेकर हैरान थे कि उन्हें अपने बेटे को बाप बनाना होगा। खैर, जब उन्होंने हामी भरी तो पूरी तरह ‘पा’ के लिए समर्पित हो गए। आप सब जानते हैं कि उन्होंने कैसे प्रति दिन मेकअप के लिए घंटों समय दिया और कड़ी मेहनत की। ‘पा’ में सबसे पहले पैसा लगाने के लिए सुनील मनचंदा तैयार हुए। ‘चीनी कम’ के प्रोडय़ूसर वही थे। बाद में अमित जी की विशेष रुचि बनी कि उनकी कंपनी एबी कॉर्प भी इसमें प्रोडय़ूसर की तरह से जुड़े।
ऑरो ( ‘पा’ में अमिताभ का चरित्र) को अमिताभ बच्चन ने ही आवाज दी?
हां, लेकिन ऑरो की नकली दांत लगा कर। आप ताज्जुब करेंगे कि उन्होंने पूरी फिल्म में अपने चरित्र (ऑरो) की डबिंग तीन दिन और कुछ घंटों में पूरी कर ली।
‘पा’ की शूटिंग के समय बाप-बेटे के रिश्ते में कोई नई बात देखी आपने?
दोनो बिल्कुल सहज थे। अभिषेक के लिए यह मुश्किल था। लेकिन वे भी एकदम सहज थे। फर्क सिर्फ इतना था कि शूटिंग के दौरान बेटे और बाप का रोल बदल जाता था। अमित जी जैसे प्रोफशनल एक्टरों के साथ काम करना एक गजब का अनुभव है।
जबकि ‘पा’ रिलीज हो गई है, प्रोजेरिया जैसे मुद्दे पर क्या आप आगे काम करेंगे?
‘पा’ मैं किसी मुद्दे पर नहीं बना रहा था। मैं तो एक पिता-पुत्र के संबंधों पर फिल्म बना रहा था और ‘पा’ दरअसल ऐसी ही फिल्म बनी है। ‘पा’ प्रोजेरिया पर नहीं है। हमारे यहां प्रोजेरिया से पीड़ित लोगों की संख्या काफी कम हैं। लोगों को धीरे-धीरे पता चल रहा है। इस फिल्म के जरिए मीडिया में देश के छोटे-बड़े शहरों और गांवों में रहने वाले पाड़ित व्यक्तियों और बच्चों की कहानियां आ रही हैं। अगर ‘पा’ के जरिए लोगों की जागरूकता बढ़े, उनकी ओर लोगों का ध्यान जाए तो बहुत अच्छा है। मेरा कोई इरादा पहले से ही मुश्किल उनकी जिंदगियों में झांकने और हलचल पैदा करने का नहीं है।
इस फिल्म में सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?
‘पा’ में अमिताभ बच्चन जरा भी अमिताभ बच्चन न दिखें, यह चुनौती। पूरी दुनिया उनके बारे में बहुत कुछ जानती है। करोड़ों दर्शकों ने उनको कई बार परदे पर देखा है। परदे पर कोई ऐसा किरदार विकसित कर पाना, जिसमें अमिताभ बच्चन वह नजर नहीं आएं, जो वे हैं। यह बतौर डॉयरेक्टर न केवल मेरे लिए बल्कि सेट पर मौजूद दूसरे कलाकारों (अभिषेक समेत) के लिए भी एक कड़ी चुनौती थी। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती खुद अमिताभ बच्चन के लिए थी। चूंकि वे इतने महान कलाकार हैं, उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और बखूबी निभाया। ‘पा’ दरअसल दुनिया के इस महान कलाकार को मेरा अभिनन्दन है।

 

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