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गोपनीयता की गाय, घाटे का सफेद हाथी

परमाणु ऊर्जा आयोग भारत की सबसे गोपनीय संस्थाओं में से है। हालांकि इसके संयंत्र सार्वजनिक हित के लिए हैं, लेकिन दूसरों उद्योगों की तरह इसके मुनाफे या जवाबदेही की चर्चा कहीं नहीं होती। न ही दूसरे सरकारी संगठनों की तरह उसे किसी संसदीय समिति को अपनी रिपोर्ट देनी होती है। सच तो यह है कि जिस संसद ने इस संस्थान को बनाया है उसी ने इसे अपनी समीक्षा से मुक्त रखा है।

कोई आम नागरिक इसके संयंत्रों के पास भी नहीं फटक सकता और कोई भी अच्छे संपर्को वाला इतिहासकार इसके रिकॉर्ड हासिल कर सकता है। लेकिन महज किस्मत की वजह से ही मुझे इसके खत-ओ-किताबत का एक हिस्सा देखने को मिल गया था। एक दशक  पहले मुझे ये कागजात मिले थे और मैंने इनकी फोटोकॉपी करवा ली थी। ये कागजात महत्वपूर्ण इसलिए हैं, क्योंकि ये सीधे तौर पर कैगा परमाणु संयंत्र में हाल में ही हुए लीकेज विवाद से संबंधित हैं।

ये कागजात 1967 के हैं, जब कांग्रेस ने लगातार चौथा आम चुनाव जीता ही था। यह मंत्रालय उस समय परमाणु ऊर्जा राज्यमंत्री एम. एस. गुरुपदस्वामी के हवाले था। वे इसके पहले प्रजा समाजवादी पार्टी के सदस्य थे, यानी उस पार्टी के, जो बौद्धिकता और स्वतंत्र सोच की बात करती थी। अपनी इसी परंपरा के तहत उन्होंने इस नए काम को काफी गंभीरता से लिया। यह संयंत्र उस समय चल रहा था।

गुरुपदस्वामी ने उसका दौरा किया। वहां कर्मचारियों और वैज्ञानिकों से बात की। उन्हें जो पता लगा वह अच्छा नहीं था और उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखी। उन्होंने लिखा कि आयोग के काम में कुछ गड़बड़ दिखाई देती है, कामों में काफी गंभीर किस्म की देरी हो रही है, कर्मचारियों का मनोबल काफी नीचा है। उनका कहना था कि कुछ ऐसा किया जाए, जिससे जवाबदेही की व्यवस्था बने।

प्रधानमंत्री को सचेत करने के बाद नए राज्यमंत्री ने मामले को सीधे आयोग के अध्यक्ष विक्रम साराभाई के सामने उठाया। उनसे परियोजना की लागत, विदेशी मुद्रा समेत पिछले कुछ साल में उस पर हुआ खर्च, देरी का कारण और काम में आने वाली बाधाओं आदि का ब्योरा मांगा। यह जानकारी ही अपने आप में महत्वपूर्ण होती, लेकिन गुरुपदस्वामी ने रेलवे और डाक तार विभाग की परियोजनाओं से इसकी तुलनात्मक समीक्षा भी मांग ली। इस मांग से परमाणु ऊर्जा आयोग में डर और खलबली पैदा हो गई।

आयोग के अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी और कहा कि वे सिर्फ प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं और आयोग के संविधान में किसी राज्यमंत्री को रिपोर्ट करने का प्रावधान नहीं है। उनका कहना था कि अगर आयोग, उसके अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के बीच बने रिश्ते को अगर बदला जाता है तो यह दुर्भायपूर्ण होगा।

प्रधानमंत्री ने इस खत पर हाथ से लिखी एक चिट लगाई (इस चिट की प्रति भी मेरे पास है) और अपने सचिव की दे दी। इस पर लिखा था- ‘गुरुपदस्वामी में काफी उत्साह है। डॉ. साराभाई मानते हैं कि यह अनावश्यक उत्साह है’।  चार दशक बाद अब यह लगता है कि वह उत्साह सही दिशा में था। स्वतंत्र शोधकर्ताओं द्वारा किए गए चार अध्ययन बताते हैं कि हमारा परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम आथिर्क रूप से नाकाम और पर्यावरण के नजरिये से तबाही वाला था। और बात यहीं खत्म नहीं होती, आयोग ने देश के लोकतांत्रिक आदर्शो को भी नजरंदाज किया।

पहले पर्यावरण पर बात करते हैं। परमाणु संयंत्र लगाए जाने का अर्थ होता है वन की कटाई। कैगा संयंत्र लगाए जाने से पश्चिमी घाट के देश के सबसे अच्छे वर्षा वन को नुकसान पहुंचा। थोरियम और यूरेनियम के खनन से उस क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हुआ। डॉ. संघमित्र और डॉ. सुरेंद्र गडकर का अध्ययन बताता है कि परमाणु संयंत्रों के आस-पास रहने वालों पर रेडिएशन का खतरा काफी ज्यादा मंडराता रहता है। फिर परमाणु दुर्घटना का खतरा हमेशा ही बना रहता है। और यहां के कूड़े का निपटारा तो एक समस्या है ही, क्योंकि यह कई हजार साल तक रेडियोएक्टिव बना रहता है।

आर्थिक क्षेत्र में ऊर्जा वैज्ञानिक अमूल्य रेड्डी का अध्ययन बताता है कि भारत में परमाणु ऊर्जा कोयले, पनबिजली और सौर ऊर्जा के मुकाबले ज्यादा महंगी पड़ती है। उन्होंने यह अध्ययन सरकारी आंकड़ों के आधार पर ही किया है। इन आंकड़ों में आयोग की सालाना रिपोर्ट भी है। सालाना रिपोर्ट ही आयोग का एकमात्र दस्तावेज है जो सार्वजनिक हो पाता है। अगर आयोग को मिलने वाली छुपी हुई सब्सिडी को भी ध्यान में रख लिया जाए तो यह तुलना और भी दिलचस्प हो जाती है। आयोग के संयंत्र देश की ऊर्जा में सिर्फ तीन फीसदी के हिस्सेदार हैं, लेकिन ऊर्जा के लिए होने वाले शोध बजट का 60 फीसदी हिस्सा उसी के पास जाता है।

परमाणु ऊर्जा एक ऐसी ऊर्जा है, जिसका मूल स्वभाव ही लोकतंत्र विरोधी है। यह अपने और आम नागरिक के बीच गोपनीयता की एक दीवार बना लेती है। जनता के चुने हुए प्रतिनिधि इसकी समीक्षा नहीं कर सकते। यहां तक कि वैज्ञानिक समुदाय इसकी समीक्षा कर सके, इसकी भी कोई सूरत नहीं होती। भारत दबाव के बाद सरकार ने परमाणु ऊर्जा नियमक बोर्ड बनाया तो, लेकिन इसमें भी आयोग के पूर्व कर्मचारी ही भरे पड़े हैं। इसमें कोई भी विश्वसनीय वैज्ञानिक नहीं है।

इन गंभीर खामियों के साथ ही अब यह खतरा भी जुड़ गया है कि ये संयंत्र अब आतंकवादियों के निशाने पर हैं। पिछले दिनों कैगा में हुई दुर्घटना की जब काफी आलोचना हुई तो परमाणु ऊर्जा निगम के अध्यक्ष ने टेलीविजन पर कहा कि इसमें कोई विदेशी हाथ हो सकता है। लेकिन सारी गोपनीयता और सुरक्षा के बाद आयोग और निगम अपने एक वाटर टॉवर को जहरीला होने से नहीं बचा सके। अगर कोई आत्मघाती हमला हो या किसी विमान से हमला हो तो उस सूरत में क्या होगा?

परमाणु ऊर्जा आयोग भारत में एक पवित्र गाय भी है और सफेद हाथी भी। सिद्धांत रूप में यह जरूरत पड़ने पर देश को परमाणु हथियार बनाकर दे सकता है इसलिए कोई भी प्रधानमंत्री इसके काम में हस्तक्षेप नहीं करता। नतीजा यह है कि देश के करदाताओं का अरबों-खरबों रुपया एक ऐसे उद्योग में लगाया जा रहा है, जो ठीक से काम नहीं करता। छह दशक बाद भी यह देश की ऊर्जा आवश्यकताओं में ज्यादा योगदान नहीं दे रहा। दूसरे विकल्पों के मुकाबले इसमें भारी लागत और खतरे तो खैर हैं ही। कैगा की घटना के बाद हम उसी मोड़ पर खड़े हैं, जहां 42 साल पहले एम. एस. गुरुपदस्वामी ने कहा था कि हमें इसकी जवाबदेही बढ़ानी चाहिए।

ramguha@vsnl.com

लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

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