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क्या होगा लिब्रहान के बाद

इधर हर कोई लिब्रहान आयोग की सिफारिशों पर लिख रहा है या चर्चा कर रहा है। मुङो लगा कि मैं क्यों नहीं अपनी बात कह सकता। यही आयोग है, जिसने छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की जांच की है। सबसे पहले मैं यह साफ कर दूं कि मुझे उस सिफारिश के मीडिया में लीक होने का कोई रंज नहीं है।

उसे लेकर संसद में बेवजह हंगामा होता रहा। आखिर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘एनडीटीवी’ ने जो कुछ किया, वह उनका प्रोफेशनल मामला था। उसके लिए उन्हें बधाई देनी चाहिए। हम यह तो मान ही सकते हैं कि उसे सरकार ने लीक नहीं किया होगा। वह उसके लिए कोई और बेहतर वक्त चुन सकती थी। शायद किसी चुनाव के मौके पर उसे भुनाना बेहतर होता। उसे जस्टिस लिब्रहान साहब ने भी लीक नहीं किया होगा। उनको जल्दी किस बात की। उसकी जांच में 17 साल लग गए। और आठ करोड़ रुपया खर्च हो गया।

वह भी एक ऐसी चीज जिसे सभी जानते हैं। आखिर सभी ने उस पूरे नाटक को टीवी पर देखा है। हम सिर्फ यही नहीं जानते कि उसके अलग-अलग किरदारों का ठीक-ठीक रोल क्या था? अब हम जान सकते हैं।
 
नरसिंह राव ने एक प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारी नही निभाई। वह खास मौकों पर चुप्पी साधने में माहिर थे। उस ट्रेजडी को वह टाल सकते थे। लेकिन उसे उन्होंने चुपचाप हो जाने दिया। इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। मैं अटल बिहारी वाजपेयी के रोल को लेकर उलझन में हूं। इसीलिए उन्हें संदेह का लाभ देना चाहूंगा। लिब्रहान ने भी उन्हें सीधे-सीधे दोषी नहीं पाया है। हो सकता है कि उनके दो चेहरे हों।

गोविंदाचार्य तो उन्हें मुखौटा कहते ही रहे हैं। बाकी के जिन नामों का जिक्र है मसलन ज्योतिषीजी मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह, विनय कटिहार वगैरह। मुझे कोई शक ओ शुबहा नहीं है कि वे उस साजिश में शामिल थे। मुझे यह भी शक नहीं है कि सभी भगवा पार्टियां एक ही हैं। मसलन आरएसएस, शिव सेना, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी। इन्होंने ही पूरी साजिश रची।

अगर कानून अपने रास्ते चला होता, तो इन सब लोगों पर एक इबादत की जगह को नुक्सान पहुंचाने के आरोप में मुकदमा चलाया गया होता। लेकिन अपने देश में कुछ और होता है। वहां इन लोगों को हीरो बना दिया जाता है। उससे भले ही देश की सेकुलर इमेज बिगड़ जाए।

इन लोगों ने बापू गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद, गफ्फार खां, शेख अब्दुल्ला, भगत सिंह, जयप्रकाश नारायण जैसे अपने महान नेताओं को नीचा दिखाया है। इन्हींकी वजह से यह देश सांप्रदायिक और सामाजिक सदभाव की जमीन बन सका। इन लोगों के लिए सबसे बड़ी सजा यह होगी कि उन्हें समाज से बाहर कर दिया जाए। उनका हुक्का पानी बंद कर देना चाहिए। जब तक वे अपने पापों का प्रायश्चित न कर लें।

हर्ता मुलर
इस साल साहित्य का नोबल पुरस्कार जर्मनी की युवा लेखिका हर्ता मुलर के नाम रहा। मैंने इससे पहले उनका नाम ही नहीं सुना था। जर्मनी के बाहर बेहद कम लोगों ने उन्हें पढ़ा होगा। अब उन्हें नोबल मिला है तो जरूर उनमें कुछ होगा। यही सोच कर मैंने उनका ग्रांटा से छपा ईनामी उपन्यास ‘द लैंड ऑफ ग्रीन प्लम्स’ मंगवाया। फिर मैंने अपने सारे काम रोक कर उसे पढ़ा। शुरुआत के कुछ पन्ने पढ़ कर मैं परेशान हुआ। 

दरअसल उनका एक वाक्य दूसरे से जुड़ ही नहीं रहा था। मुझे लगा शायद मैं ही उन्हें समझ नहीं पा रहा हूं। उसके ब्लर्ब से मुझे पता चला कि वह रुमानिया में रहने वाले जर्मन समाज के बारे में लिख रही हैं। यह समाज जर्मनी की सीमा के पास ही रहता है। दूसरे विश्व युद्ध तक वे जर्मनी के वफादार थे। भले ही राज कोई भी कर रहा हो। हालांकि वे नाजी दर्शन के बारे में बेहद कम जानते थे, लेकिन हिटलर को वे अपना फ्यूरर मानते थे। और उनके लोग जर्मन सेना में काम करते थे।

उस युद्ध के बाद रुमानिया में कम्युनिस्ट तानाशाह चाऊशेस्क्यू का राज आया। वह तो नाजी तानाशाही से भी खराब था। हर वक्त एक-एक आदमी पर नजर रखी जाती थी। अगर कोई वहां से भागना चाहे तो उसके सिपाही और कुत्ते किसीको सीमा पार नहीं करने देते थे। उन पर जुल्म ढाए जाते थे। कुछ लोगों ने तो खुदकुशी कर ली थी। कुछ ने अपने होशोहवास खो दिए थे। उन लोगों ने आपस में बातचीत के लिए अलग भाषा ही गढ़ ली थी। कई बार सोचा कि उसे बीच में ही छोड़ दूं। लेकिन किसी तरह पूरा पढ़ गया। सोचता हूं कि आखिर नोबल कमिटी ने उन्हें क्यों चुना?

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