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हमें क्या फायदा

कुछ साल पहले एक जगह पढ़ा रहा था। वहां की लाइब्रेरी में काफी कोशिश करने के बाद कुछ किताबों की मंजूरी मिली। मैंने खुश हो कर छात्रों से कहा, ‘अब किताबों की कमी नहीं रहेगी।’ एक छात्र ने कुछ मायूसी से जवाब दिया, ‘सर, जब तक किताबें आएंगी, हम तो चले ही जाएंगे। हमें क्या फायदा?’ मैं उखड़ गया था। गुस्से में मैंने कहा था, ‘हद हो गई। क्या चीजों को ऐसे देखा जाता है?’

हम जब दुनिया में आते हैं, तो क्या हमें सब कुछ खुद ही जुटाना पड़ता है? हमारे आने से पहले पूरी दुनिया होती है। हमारे जाने के बाद भी दुनिया रहती है। हम दुनिया को कुछ तो देकर जाते हैं। या कम से कम यह इच्छा तो होनी ही चाहिए कि कुछ बेहतर दे कर जाएं।

अब पेड़ को ही लीजिए। हम जिन पेड़ों की वजह से जिंदा रह पाते हैं, उसे न जाने किसने लगाया है। हर पेड़ पर राजघाट की तरह किसी महान नेता का नाम तो नहीं होता। लेकिन कोई तो उसे लगाता ही है। उसीकी वजह से हम आज उस पेड़ का आनंद  ले पाते हैं। कोई लगाता है, कोई उसका फल पाता है। जिसने लगाया है, उसने भी तो किसी और फल का आनंद लिया होगा। उसकी छाया, उसका फल वगैरह-वगैरह।

हम किसीकी मदद करते हैं। कोई हमारी मदद करता है। इसीसे जिंदगी चलती है। अगर आप किसीकी मदद कर रहे हैं, तो कोई आपकी भी तो मदद कर रहा है। और बिना मदद के कोई जी ही नहीं सकता। खासतौर पर मनुष्य को तो अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कोई न कोई चाहिए। मां, पिता, घर-बार..। मुझे किसीकी मदद नहीं चाहिए। यह कोई अहंकारी ही सोच सकता है। मेरी किसीने मदद नहीं की। यह कोई एहसान फरामोश ही कह सकता है।

इसीलिए जीवन को निरंतरता में देखना चाहिए। जीवन अगर एक बहाव है, तो फिर ठहर कर सोचने का क्या मतलब? अपना समाज तो जीवन को चक्रीय गति में देखता है। यानी हमसे पहले भी कुछ है और हमारे बाद भी शर्तिया होगा। हम कहीं बीचों-बीच होते हैं। और बीच में रहने वाला कैसे कह सकता है कि वह निरा अकेला है।

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