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भूतों का अस्तित्व

हमने तो घोस्ट राइटर ही सुने थे। बताते हैं कि एक जमाने में खूब होते थे और पॉकेट बुक्स लिखा करते थे। ये पेन नेम वाले लेखकों से अलग होते थे और कभी सामने नहीं आते थे। भूत ऐसे थोड़े ही सामने आते हैं। वे भी देखते हैं कि किसके सामने आना है और किससे छिपके रहना है। किससे डरना है और किसको डराना है। हालांकि पिछले दिनों खबरिया टीवी चैनलों ने उन्हें सार्वजनिक कर ही दिया। उन्होंने इतने भूत-प्रेत दिखाए कि जो लोग भूतों पर विश्वास नहीं करते थे, वे भी थोड़ा-थोड़ा विश्वास करने लगे कि क्या पता यार होते ही हों।

उन दिनों खबरिया चैनलों पर या तो नेता दिखते थे या भूत दिखते थे। नेता तो अपने आप में होते ही अभूतपूर्व हैं, सो चैनलवालों ने भूतों को भी अभूतपूर्वो की तरह ही पेश किया। इधर भूतों पर कई फिल्में भी बनी और चली भी। लोगोंे को विश्वास हुआ कि हां भाई भूत भी चलते हैं। चाहे उनके पांव उल्टे ही होते हैं। वे इतने चलते हैं कि अपने साथ टीवी चैनलों और फिल्मों को भी चला ले जाते हैं। बेड़ा पार लगा देते हैं। हालांकि उन्हें तो बेड़ा गर्क करनेवाला ही माना जाता था।

अब पता चला कि घोस्ट कर्मचारी भी हैं। कर्मचारी कई तरह के होते हैं। कोई स्थायी होता है। कोई अस्थायी होता है। स्थायी अभूतपूर्व होते हैं। अस्थायी को भूत बनके ही रहना पड़ता है-काम का, वरना छुट्टी हो जाने का खतरा रहता है। फिर कुछ बदली कर्मचारी होते हैं। इधर नए जमाने में ठेके के कर्मचारी भी होने लगे हैं। उन्हें भी कुछ-कुछ भूतों की तरह ही काम करना पड़ता है।

पर ये घोस्ट कर्मचारी की नयी किस्म है। ये कहीं दूर-दराज के पिछड़े इलाके में नहीं हैं। बाकायदा देश की राजधानी में हैं। एमसीडी में हैं और कोई थोड़े-बहुत नहीं हैं। हजारों की तादाद में हैं। करीब बीस हजार हैं।

दिल्ली में वैसे तो बहुत भूत रहते हैं। राजनीतिक-सांस्कृतिक कई तरह के। कुछ लोगों के सिर तक पर सवार रहते हैं। पर ये जो घोस्ट कर्मचारी हैं, ये तो एमसीडी पर सवार हैं। एमसीडी की तो खासियत यह है जी कि वह तो इस शहर के बाशिंदों को ही भूत बनाने पर आमादा है। पर यह राज अब खुला है कि यह सब तो इसीलिए था कि वहां घोस्ट कर्मचारी काम कर रहे थे। सच है जी, आदमियों को नौकरी नहीं मिलती, भूतों को मिल जाती है। दम चाहिए।

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