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दून में खनन को केन्द्र का झटका

दून वैली की नदियों से रेता, बजरी, बोल्डर और अन्य तरह के चुगान पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई के दौरान केंद्रीय पर्यावरण मंत्रलय की ओर से दी गई मजबूत दलीलों के आगे राज्य सरकार कहीं टिक नहीं पाई। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रलय ने राज्य सरकार को झटका देते हुए दून वैली में नदियों से पत्थर व रेत के चुगान को खनन गतिविधि बताते हुए कहा कि इस पर पूर्ण प्रतिबंध है और सरकारी एजेंसियों को भी इसमें छूट नहीं दी जा सकती है।

इस मामले में राज्य सरकार की कमजोर दलीलों को ठुकराते हुए सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने 6 जनवरी तक मामले की सुनवाई टाल दी। अब इसकी सुनवाई जनवरी पहले सप्ताह के बाद होगी। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री निशंक ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया था कि राज्य की नदियों से खनिज चुगान की अनुमति दी जानी चाहिए। लेकिन ताजा घटनाक्रम से साफ है कि केंद्र सरकार ने राज्य के अनुरोध को अनसुना कर दिया है। 

उत्तराखंड सरकार की एजेंसियों वन विकास निगम, गढ़वाल मंडल विकास निगम व कुमाऊं मंडल विकास निगम के पास ही दून वैली समेत राज्य के कुमाऊं क्षेत्र की नदियों से खनिज चुगान का ठेका है। केंद्र सरकार के इस तर्क कि दून वैली में नदियों से पत्थर और रेत निकालने का काम एक खनन गतिविधि है और इस पर दून वैली अधिसूचना, 1989 तथा ईआईए अधिसूचना के तहत पूर्ण प्रतिबंध है। इसलिए खनन के लिए सरकारी एजेंसियों को भी छूट नहीं दी जा सकती है।

इससे राज्य के कुमाऊं क्षेत्र की नदियों से चुगान की अनुमति पर भी संकट खड़ा हो गया है।  केंद्रीय वन एवं पर्यावरण व अतिरिक्त सचिव ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में कहा कि दून वैली अधिसूचना, 1989 तथा ईआईए (पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन) अधिसूचना, 2006 के तहत दून वैली में खनन नहीं किया जा सकता। खनन के लिए ईआईए अधिसूचना, 2006 के तहत केंद्र सरकार से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है।

इस मामले में सरकार बिना अनुमति के खनन कर रही है इसलिए यह अवैध है। केंद्र सरकार के इस रुख से राज्य सरकार की एजेंसियों का केस कमजोर माना जा रहा है। राज्य सरकार  हाईकोर्ट द्वारा 6 मई 09 को खनन पर लगाए गए प्रतिबंध को हटवाने के लिए शीर्ष अदालत में गई है।

हाईकोर्ट ने पूर्व अनुमति के अभाव में ही नदियों में खनन का काम रुकवा दिया था। शुक्रवार को उत्तराखंड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नागराज तथा रचना श्रीवास्तव ने शीर्ष अदालत को बताया कि नदियों में बाढ़ आने से रोकने के लिए रेत और बड़े पत्थर निकालने जरूरी हैं। लेकिन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन और बीएस चौहान की खंडपीठ ने उनकी यह दलील ठुकरा दी ।

उल्लेखनीय है कि नैनीताल हाईकोर्ट ने मई माह में एक जनहित याचिका पर विचार करते हुए दून वैली में रेत और पत्थर के खनन पर रोक लगा दी थी। राज्य के निकायों का कहना था कि केंद्र सरकार की अधिसूचना 1 फरवरी 89 की है जबकि उनकी खनन लीज इससे पूर्व की है। इसलिए यह अधिसूचना उन पर लागू नहीं होती। निगम और वन निगम ने कोर्ट में दलील दी कि याचिकाकर्ता निजी ठेकेदारों का आदमी है। वैली में पत्थर और रेत को महंगे दामों पर बेचने के लिए उन्होंने सरकारी खनन को बंद करवाया है।

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  • Web Title:दून में खनन को केन्द्र का झटका