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कोपेनहेगन से पहले

भारत सरकार ने कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन के पहले ही अपनी ओर से सन् 2020 तक देश में कार्बन उत्सर्जन सघनता (इंटेंसिटी) 20 से 25 प्रतिशत घटाने का वादा किया। लेकिन भारत का यह रुख कोपेनहेगन में भी बना रहेगा कि वह कुल कार्बन उत्सर्जन में कमी के किसी निश्चित लक्ष्य को नहीं मानेगा। उत्सर्जन सघनता का अर्थ है वृद्धि दर के अनुपात में कार्बन उत्सर्जन। जाहिर है पर्यावरण के लिए जागरूकता बढ़ने और टेक्नोलॉजी के चलते कार्बन सघनता कम हो रही है।

1990 से 2005 तक हमारी सघनता 17.6 प्रतिशत घटी है, इस हिसाब से 2020 तक 25 प्रतिशत का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल नहीं होगा। अगर चीन सचमुच 2020 तक अपने लक्ष्य यानी सघनता में 40 से 45 प्रतिशत कमी को हासिल कर लेता है, तब भी भारत उससे बहुत आगे होगा। इसकी वजह यह है कि भारत में पर्यावरण जागरूकता काफी पहले से है और लोकतंत्र होने की वजह से पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्थाओं, कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनता का दबाव भी रहता है, हो सकता है कि इससे विकास दर उतनी तेजी से नहीं बढ़ी हो, लेकिन जो भी विकास हुआ है उसमें पर्यावरण का अपेक्षाकृत नुकसान कम हुआ है।

चूंकि चीन में लोकतंत्र नहीं है इसलिए जब चीन में सरकार ने एक बार उदारीकरण और तेज विकास की राह पकड़ी तो फिर पर्यावरण की परवाह नहीं की। बहरहाल, चूंकि प्रदूषण का असर किसी देश में सीमित नहीं रहता और सारी दुनिया को ही उसे भुगतना होता है, इसलिए विकास की राह में चाहे विकसित देशों ने या विकासशील देशों ने कार्बन उत्सर्जन किया हो, उसका असर सारी दुनिया पर पड़ेगा।

लेकिन विकास का अर्थ जहां विकसित देशों के लिए आलीशान जीवन शैली है, वहीं विकासशील देशों की बड़ी आबादी के लिए उसका अर्थ बुनियादी सुविधाओं का सुलभ होना है और अगर विकासशील देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए तैयार होते हैं तो इसका अर्थ आबादी के बहुसंख्य हिस्से का बुनियादी सुविधाओं से महरूम रह जाना है।
   
भारत अगर प्रदूषण कम करने में ठोस योगदान देने की स्थिति में है तो वह इसलिए कि अब तक उसका रिकार्ड अपेक्षाकृत बेहतर है, उसके पास परंपरागत और आधुनिक ज्ञान है, जो साफ पर्यावरण के लिए तरीके खोज सकता है। यह अच्छा है कि कोपेनहेगन के पहले ही विकास के मौजूदा ढांचे में बदलाव के तरीके खोजे जा रहे हैं।

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