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दंगा रोकने का नुस्खा

लिब्रहान आयोग की रपट के उजास में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सांप्रदायिक हिंसा निरोधक बिल के प्रारूप को मंजूरी देकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। भारतीय जनता पार्टी इसके विरोध में खड़ी हो गई है और राज्यों के अधिकार में केंद्र सरकार के हस्तक्षेप का संघीय सवाल उठा रही है। इस आपत्ति का एक आयाम सही भी हो सकता है, लेकिन उसी के साथ यह सवाल भी है कि जो पक्ष आपत्तियां कर रहा है, उसका दामन कितना साफ है।

केंद्र की यूपीए सरकार अगर लंबे इंतजार और धमनिरपेक्ष राजनीति के दबाव के चलते ढुलमुल रवैए से बाहर निकल कर दंगा रोकने का एक नुस्खा आजमाना चाहती है तो भाजपा के मन का चोर उसे परेशान कर रहा है। हालांकि यह विधेयक अभी नए रूप में संसद में पेश होना है, पर राज्य सभा में 2005 में पेश किए गए बिल के आधार पर यही अनुमान लगाया जा रहा है कि राज्य के किसी जिले या क्षेत्र के दंगाग्रस्त होने पर केंद्र सरकार राज्य सरकार को बर्खास्त किए बिना वहां केंद्रीय सुरक्षा बल भेज सकती है।
यह भी कहा जा रहा है कि अगर केंद्र सरकार बल भेजने के लिए राज्य की इजाजत चाहेगी तो वहां की सरकार मना भी नहीं कर सकती। चूंकि कानून और व्यवस्था राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र है और अब तक किसी भी दंगे को रोकने के लिए राज्य की अनुमति के बिना केंद्र ने कहीं सुरक्षा बल नहीं भेजे हैं। इसलिए मौजूदा विधेयक एक नई व्यवस्था कायम करने वाला है और जाहिर है, भाजपा के अलावा संघीय अधिकारों के पूर्ण विभाजन में यकीन करने वाले अन्य दल भी इस पर आपत्ति कर सकते हैं।

लेकिन सवाल उठता है कि अगर राज्य सरकारें कानून और व्यवस्था को निष्पक्ष तरीके से कायम रखने के  अपने दायित्व का पालन कर रही होतीं, तो ऐसी स्थितियां आती ही नहीं। 1992 के बाबरी विध्वंस के समय, 2002 के गुजरात दंगों के दौरान और हाल में उड़ीसा के कंधमाल में चले अल्पसंख्यक विरोधी दंगों में राज्य सरकारों ने धर्म और जाति से ऊपर उठकर निष्पक्ष प्रशासनिक दायित्वों का निर्वाह नहीं किया। वहां राज्य सरकारें उन लोगों के पक्ष में खड़ी दिखीं, जिन्होंने कानून को अपने हाथ में लिया और संविधान की अवमानना की। ऐसे में नागरिकों की रक्षा करने में केंद्र की लाचारी दूर करने के लिए जहां इस तरह के कदम जरूरी हैं, वहीं यह भी देखना चाहिए कि प्रशासन के अधिकार के मुकाबले उसकी जवाबदेही को ज्यादा बढ़ाया जाए।

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