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मोबाइल टावरों से थानों का खर्च निकालने की तैयारी

यूपी की कानून व्यवस्था भी थ्री-पी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए संचालित हो सकती है। माफिया की धमकियों, डीजल चोरी और आए दिन आने वाली व्यवहारिक दिक्कतों से हलकान टेलीकाम्युनिकेशन कम्पनियों ने शासन को प्रस्ताव दिया है कि अगर यूपी के 15 सौ के करीब थानों व पुलिस लाइन में मोबाइल टावर लगाने की अनुमति दे दी जाए तो कम्पनियाँ हर थाने को बीस हजार रुपए महीना तक दे सकती हैं।

इसके अलावा उनके जनरेटर से बिजली की सुविधा और कंपनी की ओर से फ्री-फोन सेवा भी दी जाएगी। तहसील के प्रशासनिक दफ्तरों को भी इस दायरे में लिया जा सकता है। शासन के भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक डीजीपी मुख्यालय, गृह विभाग व शासन के कई अफसर इस प्रस्ताव पर गंभीर हैं।

आईजी स्तर के एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक उनकी जानकारी में यह मामला फिलहाल नक्सली इलाकों तक ही सीमित है, जहाँ मोबाइल टावरों को हमलों में उड़ाए जाने का अंदेशा होता है। इन इलाकों में टेलीकॉम कंपनियाँ पुलिस दफ्तरों को इस लिहाज से सुरक्षित मानती हैं। शासन के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि विभिन्न मोबाइल कम्पनियों की ओर से अब यह प्रस्ताव सिर्फ नक्सली इलाकों के लिए नहीं बल्कि पूरे राज्य के लिए है।

दरअसल जैसे-जैसे मोबाइल कम्पनियों का बिजनेस बढ़ रहा है, वैसे ही वैसे इस धंधे पर माफिया हावी होता जा रहा है। टावरों के रखरखाव के ठेकों के लिए जबरदस्त प्रतिद्वन्दिता है। ऐसे में टावरों की सुरक्षा को खतरा भी बढ़ा है। ऐसे में थाना परिसरों से सुरक्षित जगह कम्पनियों के लिए कोई नहीं हो सकती।

गृह सचिव महेश गुप्ता ने ऐसे प्रस्ताव की जानकारी होने से इन्कार किया पर आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि प्रस्ताव पर कुछ अधिकारियों ने नोट तैयार करके उच्चधिकारियों को भेजे हैं।

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