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27 फरवरी, 2020|4:30|IST

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उल्फा से बातचीत को लेकर सरकार सावधान

उल्फा से बातचीत को लेकर सरकार सावधान

बांग्लादेश से गिरफ्तार कर उल्फा के कुछ शीर्ष नेताओं को भारत भेजे जाने के बाद केंद्र इस प्रतिबंधित संगठन के साथ बातचीत के लिए सोच-समझ कर कदम उठा रहा है, क्योंकि सरकार 1992 के अपने कड़वे अनुभवों को दोहराना नहीं चाहती है।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार के साथ बातचीत को जरिया बना कर उल्फा ने गिरफ्तार अपने पांच नेताओं को रिहा करवा लिया था और अवसर का लाभ उठाकर सभी उग्रवादी भूमिगत हो गए थे तथा संगठन को फिर से मजबूत बना लिया।

हालांकि, असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने बातचीत के लिए आगे आने पर उल्फा के नेताओं को सुरक्षित रास्ता देने के पक्ष में हैं। गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी हिंसा छोड़ने की शर्त पर उग्रवादी संगठन के साथ बातचीत करने की इच्छा जाहिर की थी। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह शांति वार्ता तत्काल शुरू होगी या नहीं।

गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि उन लोगों को भविष्य में होने वाले किसी भी बातचीत के तौर तरीकों पर काम करना है, लेकिन आत्मसर्पण करने वाले उल्फा प्रमुख अरबिंद राजखोवा को पहले सार्वजनिक तौर पर संप्रभुता की मांग को छोड़ने की घोषणा करनी होगी।

आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि दोनों पक्षों द्वारा बातचीत के लिए अपनी इच्छा जताने के बावजूद गृह मंत्रालय के अधिकारी किसी प्रकार का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल के दौरान बातचीत की समाप्ति के बाद खुफिया एजेंसियों को बहुत शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी।

सूत्रों ने बताया कि किसी भी रास्ते की घोषणा करने से पहले हमलोग सभी पहलुओं पर विचार कर रहे हैं। हम किसी प्रकार का जोखिम उठाना नहीं चाहते हैं।

वर्ष 1992 में उल्फा के नेताओं को बातचीत की टेबल पर लाने की कोशिश असफल हो गई थी, क्योंकि संगठन के महासचिव अनूप चेतिया समेत कई उग्रवादियों को बातचीत के लिए रिहा कर दिया गया था और वे इस अवसर का लाभ उठा कर भूमिगत हो गए थे। बाद में वे बांग्लादेश भाग गए जहां उनलोगों ने शिविर स्थापित किए।

वर्ष 2005 में उल्फा ने 11 सदस्यीय दल को बातचीत के लिए मनोनीत किया था और इस दल को पीपुल्स कंसल्टेटिव ग्रुप (पीसीजी) नाम दिया गया था। इस समूह का नेतृत्व ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता इंदिरा गोस्वामी कर रहीं थी। इस समूह ने असम में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन के साथ तीन दौर की बातचीत की थी।


इंदिरा गोस्वामी के नेतृत्व में इन वार्ताओं का कोई नतीजा नहीं निकला, क्योंकि इस शांति वार्ता में उल्फा का कोई नेता शामिल नहीं था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इससे पहले कहा था कि वह संविधान के दायरे में असम से जुड़े सभी मुद्दों पर बातचीत करने को तैयार हैं।

सूत्रों ने कहा कि उल्फा को अब एक कमजोर संगठन के रूप में माना जा रहा है। उल्फा के लगभग सभी शीर्ष नेता कारागार में बंद हैं और संगठन सरकार के साथ किसी प्रकार का मोल-तोल कर सकने की स्थिति में नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर बातचीत होती है तो उल्फा को पहले हिंसा छोड़नी होगी और समूह को संप्रभुता की अपनी मांग भी छोड़नी होगी।

सूत्रों ने यह भी कहा, हम इससे भी आश्वस्त होना चाहते हैं कि इस बातचीत के अवसर का लाभ उठा कर उल्फा अपने संगठन को मजबूत नहीं करे जैसा कि उसने पहले किया है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा सभी उल्फा नेताओं के खिलाफ अलग-अलग मामले दर्ज हैं उन सभी को पहले अदालत में पेश होना पड़ेगा। सरकार अगर भविष्य में उनको किसी प्रकार की बातचीत में शामिल करना चाहती है तो उसे पहले उचित अदालत से इसकी अनुमति लेनी पड़ेगा।

वैसे अभी यह भी स्पष्ट नहीं हुआ है कि उल्फा से ऐसी कोई वार्ता सफल हो पाएगी या नहीं क्योंकि संगठन के कमांडर इन चीफ परेश बरूआ अभी भी फरार है और बातचीत करने को इच्छुक नहीं है।

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