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न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी सीआईसी के निर्देश पर रोक

न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी सीआईसी के निर्देश पर रोक

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को अपने को राहत देते हुए केन्द्रीय सूचना आयोग के उस निर्देश पर रोक लगा दी, जिसमें न्यायाधीशों की वरिष्ठता पर ध्यान न देकर तीन अन्य न्यायाधीशों की शीर्ष अदालत में नियुक्ति से संबंध सूचना को सार्वजनिक करने को कहा गया था।

उच्चतम न्यायालय ने केन्द्रीय सूचना आयोग के उस आदेश पर भी रोक लगा दी, जिसमें देश के प्रधान न्यायाधीश और मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर रघुपति के बीच एक विचाराधीन मामले में एक केन्द्रीय मंत्री के कथित हस्तक्षेप को लेकर हुई बातचीत का खुलासा करने को कहा गया था।

केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका को महान्यायवादी जीई वाहनवति ने न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और दीपक वर्मा की पीठ के समक्ष रखा, जिसके आधार पर सूचना के अधिकार के तहत याचिका दायर करने वाले को नोटिस जारी किया गया। इसी आरटीआई के आधार पर केन्द्रीय सूचना आयोग ने निर्देश दिया था।

अदालत ने तीन सप्ताह के अंदर जवाब देने और अगले दो सप्ताह में संलग्नक प्रस्तुत करने का समय दिया था। महान्यायवादी ने अधिवक्ता देवदत्त कामथ के साथ केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश पर रोक की मांग की थी। उनकी दलील थी कि इस मामले में अनेक कानूनी सवाल खडे़ होते हैं, जिन पर तुरंत विचार किए जाने की जरूरत है।

जब यह मामला अदालत में आया तो आरटीआई आवेदक एससी अग्रवाल के वकील प्रशांत भूषण भी अदालत में मौजूद थे। उच्चतम न्यायालय ने गत एक दिसंबर को अपने समक्ष एक याचिका दायर की थी, जिसमें केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश को चुनौती दी गई थी। केन्द्रीय सूचना आयोग ने शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की नियुक्ति और भारत के प्रधान न्यायाधीश तथा न्यायमूर्ति रघुपति के बीच हुई वार्ता का खुलासा करने को कहा था।

सामान्य प्रक्रिया से हटते हुए उच्चतम न्यायालय ने इस बार केन्द्रीय सूचना आयोग के खिलाफ अपने यहां ही याचिका दायर की है, जबकि इससे पहले उसने न्यायाधीशों की संपत्ति के खुलासे के मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील की थी।

इस बार उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री ने याचिका दायर की, जिसमें मुख्य सूचना आयुक्त के आदेश की यह कहते हुए आलोचना की गई कि प्रधान न्यायाधीश के पास जो सूचनाएं होती हैं वे विश्वास के आधार पर होती हैं और उन्हें पारदर्शिता कानून की धारा 8 (1) के तहत सार्वजनिक किए जाने से छूट दी जानी चाहिए।

ऐसा ही एक कानूनी मामला कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई के दायरे में आता है या नहीं, दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के समक्ष लंबित है। इससे पूर्व दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल न्यायाधीश पीठ ने उच्चतम न्यायालय के इस आग्रह को अमान्य कर दिया था कि प्रधान न्यायाधीश के पास उपलब्ध सभी सूचनाएं आरटीआई के तहत सार्वजनिक नहीं की जा सकती।

केन्द्रीय सूचना आयोग ने कई आदेशों में कहा है कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई के दायरे में आता है और प्रधान न्यायाधीश के पास उपलब्ध योजनाओं को सार्वजनिक किया जा सकता है।

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