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अपराध : कानून का डर सबसे जरूरी

सात साल से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी न करने का फैसला मेरे खयाल से गलत होगा। अगर ऐसा होता है तो यह अराजकता के दरवाजे खोलेगा। इससे सीधे तौर पर कानून का डर कम हो जाएगा।

अभी तक अपराधी जिस चीज से सबसे ज्यादा घबराते हैं, वह पुलिस हिरासत ही है। उसके बाद अगर न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाए तो उससे उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं होती। यह डर भी खत्म हो गया तो अपराधी अपराध करेंगे और मूंछ पर ताव देते घूमेंगे।

इस तरह के फैसले अक्सर हम मानवाधिकारों के नाम पर या फिर उदार मूल्यों के नाम पर कर लेते हैं। यह एक तरह से गैरजिम्मेदाराना सोच भी है, क्योंकि हम ऐसे मौकों पर इसके समाज पर पड़ने वाले कुप्रभाव की कल्पना नहीं करते। अगर कानून का डर खत्म होता है तो समाज में अराजकता बढ़ेगी। असुरक्षा बढ़ेगी। आम लोगों के सम्मान और संपत्ति को सुरक्षा देना सबसे जरूरी काम है। हमारा मकसद होना चाहिए कि समाज को अधिक से अधिक सुरक्षित बनाया जाए। इसलिए ऐसे प्रावधान नहीं अपनाए जाने चाहिए जो असुरक्षा को बढ़ाते हों।

ऐसे विचार अक्सर इसलिए आते हैं कि हम पश्चिम की नकल करने की कोशिश करते हैं। पश्चिम की व्यवस्था में बहुत सारी अच्छी चीजें हैं हम उन्हें नहीं अपनाते, इस तरह की कुछ चीजें ही लेते हैं। आप आंकड़े देखिये तो पाएंगे कि अमेरिका में जेल जाने वालों की संख्या भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा है। वहां तुरत-फुरत सजा भी हो जाती है। क्रिमनल जस्टिस सिस्टम ऐसा है कि बड़े से बड़े मामले में सजा देने में समय नहीं लगता। यही हमारे लिए भी जरूरी है।

वहां तो कई मामलों में सौ-सौ साल से भी ज्यादा की सजा हो जाती है। यह ठीक है कि गणना कुछ इस ढंग से होती है कि सारी सजाएं एक साथ चलती हैं, लेकिन कई मामलों में इतना तो होता ही है कि अपराधी जब तक जिंदा रहेगा, उसकी जिंदगी जेल में ही बीतेगी। हमारे यहां ऐसा नहीं है, हमारे यहां तो उम्र कैद भी ताउम्र कैद नहीं है।

कुछ तकनीकी किस्म के अपराधों के बारे में यह माना जा सकता है कि उसमें आरोपी को यह रियायत दी जाए। यानी ऐसे मामलों में जहां अपराधी को जेल न भेजने से उसका मनोबल न बढ़ता हो। कुछ अन्य छोटे-मोटे मामले भी हो सकते हैं। मसलन चैक बाउंस के मामलों को ही लें। वहां भी अगर किसी की नीयत में खोट पाया जाता है तो जेल भेजना जरूरी हो जाता है।

लेकिन ऐसे ज्यादातर मामलों में जेल भेजने के बजाए जुर्माना लगाए जाने का तरीका अपनाया जा सकता है। साल से कम सजा वाले मामलों में जेल न भेजे जाने वाले प्रस्ताव का महिला संगठन भी विरोध कर रहे हैं। वे मानते हैं कि इससे 498-ए के तहत दहेज प्रताड़ना के मामलों में होने वाली गिरफ्तारियां बंद हो जाएंगी। पिछले कुछ समय से यह कानून काफी विवाद में रहा है। इसके दुरुपयोग की खबरें भी आती रहती हैं। अदालत ने भी स्वीकार किया है कि इसका दुरुपयोग होता है। लेकिन जरूरी है कि इस दुरुपयोग को रोका जाए, और जहां जरूरी है तो वहां गिरफ्तारी होनी ही चाहिए। इसका भी डर न रहा तो फिर प्रताड़ना के मामले बढेंगे ही।

तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे जेलों पर दबाव कम हो जाएगा। लेकिन जेलों पर दबाव कम करने के जो दूसरे तरीके अपनाए जाने चाहिए वे नहीं अपनाए जा रहे। इसके लिए सबसे जरूरी है कि अंडर ट्रायल की समस्या को खत्म किया जाए। बहुत सारे लोग सिर्फ इसलिए कई बरस से जेल में बंद हैं कि उनकी जमानत लेने वाला भी कोई नहीं है। न जाने कितने ऐसे मामले हैं, जिनमें कैदी पर चल रहे मुकदमे में उसे जितनी सजा होनी चाहिए, उससे कहीं ज्यादा वक्त वह जेल में गुजार चुका है। उस पर चल रहा मुकदमा अभी खत्म नहीं हुआ, इसलिए वह जेल में है।

जेलों पर दबाव कम करने के लिए सबसे जरूरी यह है कि हम अपने क्रिमनल जस्टिस सिस्टम में सुधार करें। जरूरत यह है मामलों का जल्द से जल्द निपटारा हो। आपराधिक मामले बरसों-बरस अदालतों में ही न अटकते-भटकते रहें। हालांकि इस तरह की बहुत सी बातें की जाती हैं लेकिन होता आखिर में कुछ भी नहीं।

लोग कानून को सम्मान करें, यह तो होना ही चाहिए, लेकिन समाज में कानून का भय होना सबसे जरूरी है। यह भय तो वैसे ही खत्म होता जा रहा है। कानून तोड़ना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। यह मान लिया गया है कि अगर आपकी हस्ती है तो आप कानून तोड़ सकते हैं। ऐसे में जेल न भेजने का प्रस्ताव नुकसान ही पहुंचाएगा।


लेखक उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रहे हैं

प्रस्तुति- हरजिंदर

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